ओ ! पतझड़ के अंतिम त्रण
ओ ! पतझड़ के अंतिम त्रण, तुमने देखा है युग दर्पण
तुमने देखी है ज्योत्सना, तुमने देखा है चन्द्र ग्रहण
ओ ! पतझड़ के अंतिम त्रण|
तुमने देखे हैं जन्मोत्सव, तुमने देखे हैं दाहकर्म
तुमने देखी है लूटमार, तुमने देखा है दानधर्म
तुमने देखी है बाढ़ कभी, देखा तुमने सूखा, अकाल
तुमने देखा है अनुद्धत, तुमने ही देखा है धमाल
कैसे होता है नियम भंग, कैसे होता है अनुशासन
ओ ! पतझड़ के अंतिम त्रण ।
कैसे निर्धन का धन लेकर, इठलाते हैं उद्दोग पति
कैसे निर्बल शोषित होते, कैसे फलती है राजनीति
तुमने देखा है समझौता, तुमने देखा है आन्दोलन
धनवान सभी हैं लाभान्वित, निर्धन होते जाते निर्धन
कैसे मरता आयुष्यमान, कैसे जीता है मरणासन्न
ओ ! पतझड़ के अंतिम त्रण ।
और अब देखो कुछ रंग बदले नव अंकुर आये हैं बाहर
जो हवा चली है पश्चिम की, नवकोंपल पर है चढ़ा असर
क्या पता ये अंकुर अब तरु को किस ओर हांक ले जायेंगे
तुम तो एक दिन झर जाओगे फल कैसे कैसे आयेंगे
पहचान न अपनी खो बैठे, भगवान बचाये ये मधुबन
ओ ! पतझर के अंतिम त्रण ।
ओ ! पतझड़ के अंतिम त्रण, तुमने देखा है युग दर्पण
तुमने देखी है ज्योत्सना, तुमने देखा है चन्द्र ग्रहण
ओ ! पतझड़ के अंतिम त्रण|
तुमने देखे हैं जन्मोत्सव, तुमने देखे हैं दाहकर्म
तुमने देखी है लूटमार, तुमने देखा है दानधर्म
तुमने देखी है बाढ़ कभी, देखा तुमने सूखा, अकाल
तुमने देखा है अनुद्धत, तुमने ही देखा है धमाल
कैसे होता है नियम भंग, कैसे होता है अनुशासन
ओ ! पतझड़ के अंतिम त्रण ।
कैसे निर्धन का धन लेकर, इठलाते हैं उद्दोग पति
कैसे निर्बल शोषित होते, कैसे फलती है राजनीति
तुमने देखा है समझौता, तुमने देखा है आन्दोलन
धनवान सभी हैं लाभान्वित, निर्धन होते जाते निर्धन
कैसे मरता आयुष्यमान, कैसे जीता है मरणासन्न
ओ ! पतझड़ के अंतिम त्रण ।
और अब देखो कुछ रंग बदले नव अंकुर आये हैं बाहर
जो हवा चली है पश्चिम की, नवकोंपल पर है चढ़ा असर
क्या पता ये अंकुर अब तरु को किस ओर हांक ले जायेंगे
तुम तो एक दिन झर जाओगे फल कैसे कैसे आयेंगे
पहचान न अपनी खो बैठे, भगवान बचाये ये मधुबन
ओ ! पतझर के अंतिम त्रण ।








