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डा श्याम गुप्त की गज़ल--जाना होगा ...

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        गज़ल--जाना होगा ...

खुशबू छाई जो फिजाओं में तो जाना जानां |
आपसे  हमको  मुलाक़ात  को जाना होगा  |

झूम के बरसा जो सावन तो हमें ऐसा लगा,
अब तो जाना ही हमें जाना ही जाना होगा |

फिर तो ये दिल भी लगा पहलू से अपने जाने,
आपने  ही  तो  सदा  देके पुकारा  होगा |

अप थे सोच में, आयेंगे कि न आयेंगें ,
याद अपनों ने किया कैसे न आना होगा |

बड़ी शिद्दत से किया याद बुलाया ए हुज़ूर ,
कौन अब कैसे कहे, 'यार! न आना होगा' |

रूह में तुम थे समाये तो चले आये श्याम,
हम ही जब होंगे नहीं आना क्या आना होगा ||

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