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"शूल मीत बन गये" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

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फूल हो गये ज़ुदाशूल मीत बन गये।
भाव हो गये ख़ुदा, बोल गीत बन गये।।

काफ़िला बना नहीं, पथ कभी मिला नहीं,
वर्तमान थे कभी, अब अतीत बन गये।

देह थी नवल-नवल, पंक में खिला कमल,
तोतली ज़ुबान की, बातचीत बन गये।

सभ्यता के फेर में, गन्दगी के ढेर में,
मज़हबों की आड़ में, हार-जीत बन गये।

आइना कमाल है, रूप इन्द्रज़ाल है,
धूप और छाँव में, रिवाज़-रीत बन गये।

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