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"ग़ज़ल-वस्ल की शाम-गुरूसहाय भटनागर बदनाम" (प्रस्तोता-डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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महकी-महकी सी है वादियों की सबा
शौक़ से आ के इसका मज़ा लीजिए

बन गई मैं ग़ज़ल आपके सामने
चाहे जैसे मुझे गुनगुना लीजिए 

मय को पीकर अगर दिल मचलने लगे
अपना दिलबर हमें फिर बना लीजिए

ये बहारों का रँग, हुस्न की तिश्नगी
प्यास नज़रों की अपनी बुझा लीजिए

मैं बियाबां में हूँ ख़ुशनुमा इक कली
मुझको जैसे जहाँ हो सजा लीजिए

कल तलक़ आरज़ूएँ तो ‘बदनाम’ थीं
वस्ल की शाम है दिल लुटा लीजिए
(गुरूसहाय भटनागर बदनाम)

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