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ईशोपनिषद के प्रथम मन्त्र "ईशावास्यम...."के द्वितीय भाग....”तेन त्यक्तेन भुंजीथा..." . का काव्य-भावानुवाद........ डा श्याम गुप्त ...

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ईशोपनिषद के प्रथम मन्त्र  के द्वितीय भाग ..”तेन त्यक्तेन भुंजीथा..."का काव्य-भावानुवाद...... 

सब कुछ ईश्वर की ही माया, 
तेरा मेरा कुछ भी नहीं है |
जग को अपना समझ न रे नर !
तू तेरा सब कुछ वह ही है |

पर है कर्म-भाव आवश्यक,
कर्म बिना कब रह पाया नर |
यह जग बना भोग हित तेरे,
जीव अंश तू, तू ही ईश्वर |

उसे त्याग के भाव से भोगें,
कर्मों में आसक्ति न रख कर|
बिना स्वार्थ, बिन फल की इच्छा,
जो जैसा मिल जाए पाकर |

कर्मयोग है यही, बनाता -
जीवनमार्ग सहज, शुचि, रुचिकर |
जग में रहकर भी नहिं जग में,
होता लिप्त कर्मयोगी नर |

पंक मध्य ज्यों रहे जलज दल,
पंक प्रभाव न होता उस पर |
सब कुछ भोग-कर्म भी करता,
पर योगी कहलाये वह नर ||




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