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"स्वतन्त्रता अभिशाप बन गई" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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लोकतन्त्र की जय बोलो!
प्रजातन्त्र की जय बोलो!!

रंगे स्यार को दूध-मलाई,
मिलता फैनी-फैना है।
शेर गधे बनकर चरते हैं,
रूखा-शुष्क चबेना हैं।।
लोकतन्त्र की जय बोलो!
प्रजातन्त्र की जय बोलो!!

झूठ और मक्कारी फलती,
दाल नही सच्चों की गलती,
सज्जनता आँखों को मलती,
दारू पैमानों में ढलती,
लोकतन्त्र की जय बोलो!
प्रजातन्त्र की जय बोलो!!

नोटों में भगवान बिक रहे,
खुले आम ईमान बिक रहे,
छम-छम नाच रही शैतानी,
खोटे सिक्के खूब टिक रहे,
लोकतन्त्र की जय बोलो!
प्रजातन्त्र की जय बोलो!!

स्वर्ग-लोक में गाँधी रोते,
आजादी की अर्थी ढोते,
वीर-सुभाष हुए आहत हैं,
भगतसिंह भी नयन भिगोते,
लोकतन्त्र की जय बोलो!
प्रजातन्त्र की जय बोलो!!

सबके सपने चूर हुए हैं,
भाई, भाई से दूर हुए हैं,
स्वतन्त्रता अभिशाप बन गई,
मापदण्ड मजबूर हुए हैं,
लोकतन्त्र की जय बोलो!
प्रजातन्त्र की जय बोलो!!

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