![]() अंक है धवल-धवल। पंक में खिला कमल।। हाय-हाय हो रही, गली-गली में शोर है, रात ढल गई मगर, तम से भरी भोर है, बादलों में घिर गया, भास्कर अमल-धवल। अंक है धवल-धवल। पंक में खिला कमल।। पर्वतों की चोटियाँ, बर्फ से गयीं निखर, सर्दियों के बाद भी, शीत की चली लहर, चीड़-देवदार आज, गीत गा रहे नवल। अंक है धवल-धवल। पंक में खिला कमल।। चाँदनी लिए हुए, चाँद भी डरा-डरा, पादपों ने खो दिया रूप निज हरा-भरा, पश्चिमी लिबास में, रूप खो गया सरल। अंक है धवल-धवल। पंक में खिला कमल।। |
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"पंक में खिला कमल" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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