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"आदमी को हवस ही खाने लगी" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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जिन्दगी और मौत पर भीहवस है छाने लगी।
आदमी कोआदमी की हवस ही खाने लगी।।

हवस के कारणयहाँ गणतन्त्रता भी सो रही।
दासता सी आजआजादी निबल को हो रही।।

पालिकाओं और सदन मेंहवस का ही शोर है।
हवस के कारणबशर लगने लगा अब चोर है।।

उच्च-शिक्षा में अशिक्षाहवस बन कर पल रही।
न्याय में अन्याय की हीहोड़ जैसी चल रही।।

हबस के साये में हीशासन-प्रशासन चल रहा।
हवस के साये में ही नरनारियों को छल रहा।।

डॉक्टरोंकारीगरों कोहवस ने छोड़ा नही।
मास्टरों ने भी हवस सेअपना मुँह मोड़ा नही।।

बस हवस के जोर पर हीचल रही है नौकरी।
कामचोरों की धरोहरबन गयी अब चाकरी।।

हवस के बल पर हलाहलराजनीतिक घोलते।
हवस की धुन में सुखनवरपोल इनकी खोलते।।

चल पड़े उद्योग -धन्धेअब हवस की दौड़ में।
पा गये अल्लाह के बन्देकद हवस की होड़ में।।

राजनीति अबकलह और घात जैसी हो गयी।
अब हवस शैतानियत कीआँत जैसी हो गयी।।

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