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"मेरा अनुरोध" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

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मित्रों!
      प्रसन्नता की बात है कि दोहों पर 36 पोस्ट अब तक आ चुकी हैं। मुझे आशा ही नहीं अपितु पूरा विश्वास है कि हमारे पाठकों को दोहा छन्द के बारे में काफी कुछ सीखने को मिला होगा। सोमवार 15-07-2013 से किसी और छन्द पर चर्चा शुरू की जायेगी।
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कृपया सम्बन्धित दोहाकार ध्यान देंगे-
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इस दोहे में कुछ खटक रहा है-
दुर्बुद्धि हर नष्ट हो, बन कर रहें प्रबुद्ध |
सब जन कुमति निवार कर,करें धारणा शुद्ध ||
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इसकी प्रथम पंक्ति में कुछ तो गड़बड़ है..। 
अगर इसे इस प्रकार कर दें तो शायद शुद्ध हो जाये -
मेधावी हो लोग सब, बन कर रहें प्रबुद्ध |
सारी कुमति निवार कर,करें धारणा शुद्ध ||
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इसे भी देख लें! 
नए वर्ष में न मिले, कोई कठिन मुकाम |
थोड़े सबल प्रयास से, बन जाएं सब काम ||
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दोहे के प्रथम चरण में एक मात्रा कम है-
नए वर्ष में ना मिले, कोई कठिन मुकाम |
थोड़े सबल प्रयास से, बन जाएं सब काम ||
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एक दोहा और देखिए-
तेरे कुकृत्य का मनुज, होगा बुरा प्रभाव।
आने वाली पीढ़िया, पायेंगी बस घाव।।
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दोहे के प्रथम चरण में एक मात्रा अधिक है-
तेरे कर्मों का मनुज, होगा बुरा प्रभाव।
आने वाली पीढ़िया, पायेंगी बस घाव।।
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सुधि आई मधु-रात्रि की,   भेजी  प्रियतम गेह |
सास,ससुर और ननद का,पाया अनुपम स्नेह |
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दोहे के प्रथम चरण में एक मात्रा अधिक है-
सुधि आई मधु-रात की,   भेजी  प्रियतम गेह |
सास,ससुर और ननद का,पाया अनुपम स्नेह |
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मलयानल सी चल पड़ी, ले चन्दन की गंध |
पूर्ण - रात्रि टूटे सभी, पुन:- पुन: प्रतिबंध ||
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दोहे के तृतीय चरण में एक मात्रा अधिक है-
मलयानल सी चल पड़ी, ले चन्दन की गंध |
टूटे सभी सारी रात भर, पुन:- पुन: प्रतिबंध ||
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कितने बौने हो गए, रिश्तों के उत्कर्ष |
पल-पल बनते टूटते, न विषाद न हर्ष |
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दोहे के चौथे चरण में एक मात्रा कम है-
कितने बौने हो गए, रिश्तों के उत्कर्ष |
पल-पल बनते टूटते, न विषाद न हर्ष |
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कितने बौने हो गए, रिश्तों के उत्कर्ष |
पल-पल बनते टूटते, ये कोमल अनुदर्ष |
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खिची कमान भोंहें रची, पलक सितारे डाल |
नयन कटीले रख दिए, मृग से नयन निकाल |
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दोहे के प्रथम चरण में एक मात्रा अधिक है-
भौंहें खिचीं कमान सी, पलक सितारे डाल |
नयन कटीले रख दिए, मृग से नयन निकाल |
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इस दोहे के तृतीय चरण में एक मात्रा अधिक है-
ना कोई चूल्ह जले, ना लकड़ी ना तेल।
मन्त्रियों तक दौड़ रही, सिलेण्डरों की रेल।।
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ना कोई चूल्ह जले, ना लकड़ी ना तेल।
दौड़ वजीरों तक रही, सिलेण्डरों की रेल।।
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सरिता भाटिया जी द्वारा लिखे गये निम्न दोहों में भी कुछ खटकता है-
सुप्रभात दोहे रचने,  मैं आई हूँ आज |
अधर पर मुस्कान लिए,करती हूँ आगाज ||
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मेरे विचार से तो ये दोहा निम्नवत होना चाहिए था-
सुप्रभात के दोहरे, मैं लायी हूँ आज।
अधरों पर मुस्कान ले, करती हूँ आगाज।।
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निम्न दोहे में भी गेयता में कुछ रुकावट प्रतीत होती है मुझे!
रोज ले आए नई ,सुबह सुखद सन्देश |
पूरी हो हर कामना ,संकट हरे गणेश||
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अगर दोहे को इस प्रकार लिखा जाता तो गेयता बिल्कुल भी प्रभावित नहीं होती 
और भाव भी ज्यों के त्यों ही रहते..
प्रतिदिन ही हम भोर में, लिखते हैं सन्देश |
पूरी हो हर कामना ,संकट हरें गणेश||
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निम्न दोहे की दूसरी पंक्ति भी गेयता को प्रभावित करती है। 
चूम उठाया भोर ने ,ख़ुशी मिल गई ख़ास | 
सुबह संदेश आपका ,दे गया नई आस  ||
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मेरे अनुसार तो इसे निम्न प्रकार लिखा जाना चाहिए था...
चूम उठाया भोर ने ,ख़ुशी मिल गई ख़ास | 
सुप्रभात का आगमन, जगा गया उल्लास ||
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मित्रों!
     मैंने पक्षपात रहित होकर अब तक प्रकाशित दोहों का विश्लेषण आपके समक्ष प्रस्तुत किया है।
इस परिपेक्ष्य में बहन राजेश कुमारी जी का निम्न दोहा ही काफी है-
गलती से मत  भागिये ,छुपना है बेकार|
गलती, गलती ही रहे ,हो कोई आकार||
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सभी रचनाधर्मियों से मेरा अनुरोध है कि छन्द से सम्बन्धित आलेख या छन्दबद्ध रचना ही यहाँ प्रकाशित करें।
क्योंकि सृजनमंच छन्दों को सीखने और सिखाने का ही 
ऑनलाइन मंच है।
सादर आपका-
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’

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