-----बात ग़ज़ल की -----
. ( -----कविता व शायरी ---- कविता, काव्य या साहित्य किसी विशेष, कालखंड, भाषा, देश या संस्कृति से बंधित नहीं होते | मानव जब मात्र मानव था जहां जाति, देश, वर्ण, काल, भाषा, संस्कृति से कोई सम्बन्ध नहीं था तब भी प्रकृति के रोमांच, भय, आशा-निराशा, सुख-दुःख आदि का अकेले में अथवा अन्य से सम्प्रेषण- शब्दहीन इंगितों, अर्थहीन उच्चारण स्वरों में करता होगा |
------आदिदेव शिव के डमरू से निसृतध्वनि से बोलियाँ, अक्षर, शब्द की उत्पत्ति के साथ ही श्रुति रूप में कविता का आविर्भाव हुआ|
-----देव-संस्कृति में शिव व आदिशक्ति की अभाषित रूप में व्यक्त प्रणय-विरह की सर्वप्रथम कथा के उपरांत देव-मानव या मानव संस्कृति की, मानव इतिहास की सर्वप्रथम भाषित रूप में व्यक्त प्रणय-विरह गाथा.... ‘उर्वशी–पुरुरवा’ ....की है |
------कहते हैं कि सुमेरु क्षेत्र, जम्बू-द्वीप, इलावर्त-खंड स्थित इन्द्रलोक या आज के उजबेकिस्तान की अप्सरा ( बसरे की हूर) उर्वशी, भरतखंड के राजा पुरुरवा पर मोहित होकर उसकी पत्नी बनी जो अपने देश से उत्तम नस्ल की भेड़ें तथा गले के लटकाने का स्थाली पात्र, वर्फीले देशों की अंगीठी –कांगड़ी- जो गले में लटकाई जाती है, लेकर आयी।
-------प्रणय-सुख भोगने के पश्चात उर्वशी …गंधर्वों अफरीदियों के साथ अपने देश चली गई और पुरूरवा उसके विरह में छाती पीटता रोता रहा, विश्व भर में उसे खोजता रहा। उसका विरह-रूदन गीत ऋग्वेद के मंत्रों में है, यहीं से संगीत, साहित्य और काव्य का प्रारम्भ हुआ।
------अर्वन देश (घोड़ों का देश) अरब तथा फारस के कवियों ने इसी की नकल में रूवाइयां लिखीं एवं तत्पश्चात ग़ज़ल आदि शायरी की विभिन्न विधाएं परवान चढी जिनमें प्रणय भावों के साथ-साथ मूलतः उत्कट विरह वेदना का निरूपण है । ------शायरी ईरान होती हुई भारत में उर्दू भाषा के माध्यम से आयी, प्रचलित हुई और सर्वग्राही भारतीय संस्कृति के स्वरूपानुसार हिन्दी ने इसे हिन्दुस्तानी-भारतीय बनाकर समाहित कर लिया| आज देवनागरी लिपि में उर्दू के साथ-साथ हिन्दुस्तानी, हिन्दी एवं अन्य सभी भारतीय क्षेत्रीय भाषाओं में भी शायरी की जा रही है |
-------शायरी अरबी, फारसी व उर्दू जुबान की काव्य-कला है | इसमें गज़ल, नज़्म, रुबाई, कते व शे’र आदि विविध छंद व काव्य-विधाएं प्रयोग होती हैं, जिनमें गज़ल सर्वाधिक लोकप्रिय हुई |
------गज़ल मूलतः शे’रों (अशार या अशआर) की मालिका होती है और प्रायः इसका प्रत्येक शे’र विषय–भाव में स्वतंत्र होता है |----
----- यहाँ हम ग़ज़ल के मूल रूप-भावों के बाते में बात करेंगे ....)
गज़लदर्दे-दिलकीबातबयाँकरनेकासबसेमाकूलवखुशनुमांअंदाज़है | इसकाशिल्पभीअनूठाहै | नज़्म रुबाइयों, छंदों, गीतों सेजुदा | इसीलियेविश्वभरमेंजन-सामान्यमेंप्रचलितहुई | हिन्दीकाव्य-कलामेंइसप्रकारकेशिल्पकीविधानहींमिलती |परन्तु हाँ, घनाक्षरी-छंद ( कवित्त ) एवं सवैया छंद का शिल्प अवश्य ग़ज़ल की ही पद्धति का शिल्प है जिसमें रदीफ़ व काफिया के ही शब्द-भाव रहते हैं और गैर-रदीफ़ ग़ज़ल के भाव भी, परन्तु मतला नहीं होता। मेरे विचार से शायद कवित्त-छंद, ग़ज़ल का मूल प्रारम्भिक रूप है। उदाहरण देखिये......निम्न घनाक्षरी में “रही” रदीफ़है एवं शरमा व हरषा...आदिकाफियाहैं.....
“ गाये कोयलिया तोता मैना बतकही करें,
कोंपलें लजाईं कली कली शरमारही।
झूमें नव पल्लव चहक रहे खग वृन्द,
आम्र बृक्ष बौर आये, ऋतु हरषारही। “ --- डा श्याम गुप्त
इसी प्रकार गैर-रदीफ़ ग़ज़ल का प्रारूप घनाक्षरीदेखें --- जिसमें पदांत स्वयंसुजानी ...पुरानी आदिकाफिया है।
“थर थर थर थर कांपें सब नारी नर,
आई फिर शीत ऋतु सखि वो सुजानी।
सिहरि सिहरि उठे जियरा पखेरू सखि,
उर मांहि उमंगाये प्रीति वो पुरानी।
बाल वृद्ध नर नारी बैठे धूप ताप रहे,
धूप भी है कुछ खोई-सोई अलसानी।
शीत की लहर तीर भांति तन वेधि रही,
मन उठे प्रीति की वो लहर अजानी।” ---डा श्याम गुप्त
सवैया छंद के प्रारूप भी देखें----
-----बा रदीफ़ प्रारूप....
पीने वाला यही चाहता गली गली मधुशाला हो |
हर नुक्कड़ हर मोड़ जो मिले मदिरा पीने वाला हो |
अपनी अपनी सोच सभी की मन गोरा या काला हो |
सभी चाहते उनकी दुनिया में हर ओर उजाला हो || ---डा श्याम गुप्त
------गैर रदीफ़ प्रारूप देखें----
बैन वही जो उचारे सदा वही गोविन्द नाम भजे जग सारो |
रसना वही रसधार बहाय भजे जेहि गोविन्द नाम पियारो |
भक्ति वही गज़राज करी परे दुःख: में गोविन्द काज संवारो |
श्याम वही नर गोविन्द गोविन्द गोविन्द गोविन्द नाम उचारो || --डा श्याम गुप्त
मैंकोईशायरीवगज़लकाविशेषज्ञज्ञातानहींहूँ | परन्तुहमलोगहिन्दीफिल्मोंकेगीतसुनतेहुएबड़ेहुएहैंजिनमेंवाद्य-इंस्ट्रूमेंटेशनकीसुविधाहेतुगज़लवनज़्मआदिकोभीगीतकीभांतिप्रस्तुतकियाजातारहाहै-यथा….साहिरलुधियानवीकी प्रसिद्द हिन्दी ग़ज़ल...
संसारसेभागेफिरतेहोसंसारकोतुमक्यापाओगे।
इसलोककोभीअपनानसकेउसलोकमेंभीपछताओगे।
हमकहतेहैंयेजगअपनाहैतुमकहतेहोझूठासपनाहै
हमजन्मबिताकरजाएंगेतुमजन्मगँवाकरजाओगे।
छंदोंवगीतोंकेसाथ-साथदोहावअगीत-छंदलिखतेहुएवगज़लसुनते, पढतेहुएमैंनेयहअनुभवकियाकिउर्दूशे’रभीसंक्षिप्ततावसटीकभाव-सम्प्रेषणमेंदोहेवअगीतकीभांतिहीहैऔरइसकाशिल्पदोहेकीभांति ...अतःलिखाजासकताहै, औरनज्मेंतोतुकांत-अतुकांतगीतकेभांतिहीहैं, औरगज़लों–नज्मोंकासिलसिलाचलनेलगा |
गज़लमूलतःअरबीभाषाकागीति-काव्यहैजोकाव्यात्मकअन्त्यानुप्रासयुक्तछंदहैऔरअरबीभाषामें“कसीदा”अर्थातप्रशस्ति-गानहेतुप्रयोगहोताथाजोराजा-महाराजाओंकेलिएगायेजातेथेएवंअसहनीयलंबे-लंबेवर्णनयुक्तहोतेथेजिनमेंऔरतोंवऔरतोंकेबारेमेंगुफ्तगूएकमूलविषय-भागभीहोताथा | कसीदाकेउसीभाग“ताशिब“कोपृथककरकेगज़लकारूपवनामदियागया |
गज़लशब्दअरबीरेगिस्तानमेंपाएजानेवालेएकछोटे, चंचलपशुहिरण ( याहिरणी, मृग-मृगी ) सेलियागयाहैजिसेअरबीमें‘ग़ज़ल’ (ghazal या guzal ) कहाजाताहै | इसकीचमकदार, भोली-भालीनशीलीआँखें, पतलीलंबीटांगें, इधर-उधरउछल-उछलकरएकजगहनटिकनेवाली, नखरीलीचालकेकारणउसकीतुलनाअतिशयसौंदर्यकेपरकीयाप्रतिमानवालीस्त्रीसेकीजातीथीजैसेहिन्दीमेंमृगनयनी | अरबीलोगइसकाशिकारबड़ेशौकसेकरतेथे | अतःअरब-कलावप्रेम-काव्यमेंस्त्री-सौंदर्य, प्रेम, छलना, विरह-वियोग, दर्दकाप्रतिमान‘गज़ल’केनामसेप्रचलितहुआ| जैसेभारतीयकाव्य-गीतोंमेंवीणा–सारंगकापीड़ात्मक-भावुकप्रसंग |
शायरफिराकगोरखपुरीकेअनुसार जबकोईशिकारीजंगलमेंकुत्तोंकेसाथहिरनकापीछाकरताहैंऔरहिरनभागते-भागतेझाड़ीमेंफंसजाताहैऔर निकलनहीं पाता, उससमयउसकेकंठसेएकदर्दभरीआवाजनिकलतीहै, उसीकरूणस्वरकोगजलकहतेहैं. इसलियेविवशताकादिव्यतमरूपमेंप्रकटहोना, स्वरकाकरूणतमहोजानाहीगजलकाआदर्शहै |
यहीगज़लकाअर्थभी ..अर्थात‘इश्के-मजाज़ी‘- आशिक-माशूकवार्तायाप्रेम-गीत, जिनमेंमूलतःविरहवियोगकीउच्चतरअभिव्यक्तिहोतीहै|मानव इतिहास की सर्वप्रथम प्रणय-विरह गाथा उत्तरापथ-उज्बेकिस्तान की अप्सरा उर्वशी एवं भरतखंड के नृपति पुरुरवा की है| उर्वशी के चले जाने पर पुरुरवा के विरह वेदनात्मक गीत ऋग्वेद में वर्णित हैं| यहीं से साहित्य व काव्य का प्रादुर्भाव हुआ | अरबी-फारसी कवियों ने इसी पर रुबाइयां लिखींजो शायरी कहलाई एवं उसकी एक विशिष्ट विधा ग़ज़ल के नाम से परवान चढी |इसीलियेग़ज़लमेंशमा-परवाना, दीपक-शलभ, गुल-बुलबुल, कलिका-भ्रमरआदिप्रसंगप्रभावीहुए | अरबीगज़लईरानहोतीहुईसारेविश्वमेंफ़ैलीऔरजर्मनवइंग्लिशमेंकाफीलोक-प्रियहुई | यथा..अमेरिकीअंग्रेज़ीशायर ..आगाशाहिदअलीकश्मीरीकी एकअंग्रेज़ीगज़लकानमूनापेशहै...
Where are you now? Who lies beneath your spell tonight.
Whom else rapture’s road you expel tonight ? My rivals,for your love, you have invited them all.
This is mereinsult, this is no farewell to night.
गज़लकामूलछंदशे’रयाशेअरहै | शेरवास्तवमें‘दोहा’काहीविकसितरूपहैजोसंक्षिप्ततामेंतीब्रवसटीकभाव-सम्प्रेषणहेतुसर्वश्रेष्ठछंदहै | आजकलउसकेअतुकांतरूप-भावछंद, मेरे द्वारा सृजित..अगीत, नव-अगीतवत्रिपदा-अगीतभीप्रचलितहैं| अरबी, तुर्कीफारसीमेंभीइसे‘दोहा’हीकहाजाताहैवअंग्रेज़ीमेंकसीदामोनोराइम( quasida mono rhyme)| अतःजोदोहामेंसिद्धहस्तहैअगीतलिखसकताहैवहशे’रभीलिखसकताहै..गज़लभी | शे’रोंकीमालिकाहीगज़लहै |ग़ज़लोंकेऐसेसंग्रहकोजिसमेंहरहर्फसेकमसेकमएकग़ज़लअवश्यहोदीवानकहतेहैं।
तुकांतताकेअनुसारग़ज़लेंमुअद्दसयामुकफ्फाहोतीहै| मुअद्दसगज़लमेंरदीफऔरकाफियादोनोंकाध्यानरखाजाताहैइसेमुरद्दफ़ग़ज़ल भीकहतेहैं .. यथा ....
उनसेमिलेतोमीनाओसागरलिएहुए,
हमसेमिलेतोजंगकातेवरलिएहुए
लड़कीकिसीग़रीबकीसड़कोंपेआगई
गालीलबोंपेहाथमेंपत्थरलिएहुए |... - (जमीलहापुडी)
एवंमुकफ्फाग़ज़लमेंकेवलकाफियाकाध्यानरखाजाताहै इसे ग़ैरमुरद्दफ़ यागैररदीफ़ग़ज़लभीकहतेहैं| जैसे...
गालीलबोंपेहाथमेंपत्थरलिएहुए |... - (जमीलहापुडी)
एवंमुकफ्फाग़ज़लमेंकेवलकाफियाकाध्यानरखाजाताहै इसे ग़ैरमुरद्दफ़ यागैररदीफ़ग़ज़लभीकहतेहैं| जैसे...
जग कुछ भी कहे दास्ताँ तो सुनायेंगे |
साथ मोहब्बत का निभाते ही जायेंगे |
खाई है कसम न जाने की मयखाने
श्याम यादों की मय पीना न भुलायेंगे | ...डा श्याम गुप्त
ग़ज़लमें ग़ज़लकाप्रत्येकशे'रअपनेआपमेंपूर्णहोताहैतथाशायरग़ज़लकेप्रत्येकशे'रमेंअलगअलगभावकोव्यक्तकरसकताहैएवं प्रत्येक शेर में एक ही मूल भाव को क्रमिक भी रख सकता है |जबकिसीग़ज़लकेसभीशेरएकहीभावकोकेन्द्रमानकरलिखेगएहोंतोऐसीग़ज़लकोक्रमिक, जारी अर्थात मुसल्सलग़ज़लकहतेहैं| यदिग़ज़लकेप्रत्येकशे'रअलगअलगभावकोव्यक्तकरेंतोऐसीग़ज़लकोग़ैरमुसल्सलग़ज़लकहतेहैं
वस्तुतः काव्यके मूल भाव के अनुरूप ग़ज़लमेंभीतकनीककीअपेक्षाभाव, प्रभावोत्पादकतावप्रवाहहीअच्छीग़ज़लकीपहचानहैजिसमेंमौलिकताहो, जिससेगीतवकविताकीहीभांतिपढ़नेवालासमझेकियहउसकीस्वयंकीदिलकी बातोंकावर्णनहै | प्रायःसुरूचिपूर्ण वजाने-पहचानेऔरसरलशब्दोंकाहीप्रयोगहोनाचाहिए | क्लिष्ट शब्दप्रवाह, गति, सम्प्रेषणता एवंकाव्यानंदमेंअवरोधउत्पन्नकरतेहैं | भावचाहेकितनाभीउच्चहो, छंदचाहेकितनाहीउपयुक्तवसुंदरहोलेकिनकथ्यकीअस्पष्टतावतथ्यकीअवास्तविकताएवंउचितशब्दचयनवभाषाव्याकरणीयशब्दक्रमआदिकेनहोनेसेग़ज़लयाकविताप्रभावहीनहो जातीहै।यह प्रायः काफिया या रदीफ़ को पूर्वोक्त से समानकरने के क्रम में होता है, इसीलिये तो ग़ज़ल कहना आसान नहीं है |अस्पष्टभाव, कथ्यएवंतथ्य केबारेमेंएकप्रसिद्दशेरहै-
मगसको यूंबागमेंजानेनदीजिये
महज़परवानेबर्बादहोजाएंगे |
शेरलाजवाबहैलेकिनउसकाअर्थ समझकेपरेहै। व्याख्याहैकि - ऐमाली तूमगस (मधुमक्खी)कोबागमें न जाने दे|वहगुलोंकारसचूसकरपेड़परशहदकाछत्ताबनायेगी, उससेमोमनिकलेगा, उससेशमाबनेगी|जबशमाजलेगीतोबेचारापरवानाउसपरमंडराएगाऔरबिना वजहजलकरराखहोजाएगा।
शब्द क्रमभी हिन्दी में अत्यंत महत्त्व रखता है | ग़ज़ल में शब्द क्रम का ख्याल न रहने से अर्थ-अनर्थ होजाता है देखिये ...
नर्म होकर रुई सी लगी
वो जो लड़की थी सख्त वारिश में| ...सूर्यभानु गुप्त, दै. जा.
शायदकविकहनाचाहताहैकिजो लड़की सख्त थी वो भी वारिश में भीग कर नर्म होगई, परन्तु असम्बद्ध स्थान पर वारिश शब्द रखने से लगता है कि लड़की वारिश में सख्त थी | तथा----
कहाँखोगईउसकीचीखेंहवामें
हुआजोपरिंदाज़िबहढूँढताहै- ---संजयमासूम
शायदकविकहनाचाहताहैकि'ज़िबह' (कत्ल) हुआपंछीहवामेंखोगईअपनी'चीखें'ढूँढरहाहै।लेकिन'ज़िबह'ल़फ़्ज़गलतजगहपरआनेसेअर्थयहीनिकलताहैकिवहज़िबहकीतलाशमेंहै।
भारतमेंशायरीवगज़लफारसीकेसाथसूफी-संतोंकेप्रभाववशप्रचलितहुईजिसकेछंदसंस्कृतछंदोंकेसमनुरूपहोतेहैं | फारसीमेंगज़लकेविषयरूपमेंसूफीप्रभावसेशब्दइश्के-मजाज़ीकेहोतेहुएभीअर्थरूपमें‘इश्केहकीकी’अर्थातईश्वर-प्रेम, भक्ति, अध्यात्म, दर्शनआदिसम्मिलितहोगये| प्रेमीकोसाधकऔरप्रेमिकाकोब्रह्मकादर्जामिलगया।सूफीसाधना विरहप्रधानसाधनाहै।इसलिएफ़ारसीग़ज़लोंमेंभी संयोगकेबजायवियोगपक्षकोहीप्रधानतामिली।
फारसीसेभारतमेंउर्दूमेंआनेपरसामयिकराजभाषाकेकारणविविधसामयिकविषयवभारतीयप्रतीकवकथ्यआनेलगे | प्रारंभिकदौरमेंउर्दूगज़लमेंश्रंगारकेदोनोंपक्षोंसंयोग-वियोगकाहीवर्णनरहताथालेकिनबादमेंउसमेंपरिवर्तनआया।उसमेंउपदेश, नीति, चिंतनऔरदेश-प्रेमकीबातोंकाज़िक्रकियाजानेलगायथा---
सरफ़रोशीकीतमन्नाअबहमारेदिलमेंहैं
देखनाहैज़ोरकितनाबाजुएकातिलमेंहैं
वक्तआनेदेबताएंगेतुझेऐआसमाँ
हमअभीसेक्याबताएंक्याहमारेदिलमेंहै। - --रामप्रसादबिस्मिल
उर्दूसेहिन्दुस्तानीवहिन्दीमेंआनेपरगज़लमेंवर्ण्य-विषयोंकाएकविराटसंसारनिर्मितहुआऔरहरभारतीयभाषामेंगज़लकहीजानेलगी | तदपिसाकी, मीनाओसागरवइश्के-मजाज़ीगजलकासदैवहीप्रियविषयबनारहा | बकौलमिर्जागालिव....
“बनतीनहींहैवादाओसागरकहेबगैर“ |
यूंतोहिन्दीमेंग़ज़लकबीरदासजीद्वाराभीकहीगयीबताईजातीहैजिसे
कतिपयविद्वानोंद्वाराहिन्दीकीसर्वप्रथमग़ज़लकहाजाताहै, यथा....
“ हमनहैइश्कमस्ताना, हमनकोहोशियारीक्या ?
रहेंआज़ादयाजगसे, हमनदुनियासेयारीक्या ?
कबीराइश्ककामारा, दुईकोदूरकरदिलसे,
जोचलनाराहनाज़ुकहै, हमनसरबोझभारीक्या ? “.
परन्तुमेरेविचारसेइसग़ज़लकीभाषाकबीरकीभाषासेमेलनहींखाती | होसकताहैयहप्रक्षिप्तहोएवंकबीरनामकेकिसीऔरगज़लकारनेइसेकहाहो, एक शायर शाहिद कबीर भी हुए हैं |
वास्तवमेंतो हिन्दीमेंगज़लकाप्राम्म्भआगरामेंजन्मेवपलेशायर‘अमीरखुसरो’ (१२-१३वींशताब्दी) सेहुआजिसनेसबसेपहलेइसभाषाको‘हिन्दवी’कहाऔरवहीआगेचलकर‘हिन्दी’ कहलाई | खुसरोअपनेग़ज़लोंकेमिसरेकापहलाभागफारसीयाउर्दूमेंवदूसराभागहिन्दवीमेंकहतेथे | उदाहरणार्थ...
“जेहाले मिस्कीं मकुलतगाफुल,
दुरायेनैनाबनाएबतियाँ |
किताब-ए-हिजां, न दारम-ए-जाँ,
नलेहुकाहेलगायछतियाँ |” १७वींसदीमेंउर्दूकेपहलेशायर‘वली’ नेभीहिन्दीकोअपनायावदेवनागरीलिपिकाप्रयोगकिया | ..यथा....
“सजनसुखसेती खोलो नकाबआहिस्ता-आहिस्ता,
किज्योंगुलसेनिकलताहैगुलावआहिस्ता-आहिस्ता |
सदियोंतकगज़लराजा-नबावोंकेदरबारोंमेंसिर्फइश्कियामानसिकविचारबनीरहीजिसेउच्चकोटिकीकलामानाजातारहा | परन्तु१८वीं सदीमेंआगराकेनजीरअकबरावादी नेशायरीकोसामान्यजनसेजोड़ाऔरहिन्दी गज़लें लिखी एवं १९वींसदीकेप्रारम्भमेंमिर्ज़ागालिवनेमानवीयजीवनकेगीतोंसे | उदाहरणार्थ.....
”जबफागुनरंगझलकतेहों, तबदेखबहारेंहोलीकी |
परियोंकेरंगदमकतेहों, तबदेखबहारेंहोलीकी |” - ---नज़ीरअकबरावादी--- तथा....
“गालिवबुरानमानजोवाइज़बुराकहे ,
ऐसाभीहैकोईकिसबअच्छाकहेंजिसे|.......गालिव
१८वींसदीमेंगज़लकार इंसा अल्ला खां, के अलावा हिन्दीमेंगज़लकीपहलमेंभारतेंदुहरिश्चंद्र, निराला, जयशंकरप्रसाद आदिनेसरोकारोंकीअभिव्यक्तिवलोक-चेतनाकेस्वरदिए..यथानिरालानेकहा...
“लोकमेंबंटजायजोपूंजीतुम्हारेदिलमेंहै“
उन्हें अवकाश मिलता ही कहाँ है मुझसे मिलने का
किसी से पूछ लेते हैं यही उपकार करते हैं| ...जयशंकर प्रसाद
तत्पश्चात गालिव, जोक, मोमिन, दाग, अकबर इलाहाबादी, चकबस्त, इक़बाल. फिराक, जिगर मुरादाबादी आदि उर्दू ग़ज़लकारों के साथ साथ वाजिद अली शाह, बहादुरशाह ज़फर अदि ने भी हिन्दी का प्रयोग किया..
दिले नादाँ तुझे हुआ क्या है
आखिर इस दर्द की दवा क्या है | ---बहादुर शाह ज़फर
तुम मेरे पास होते हो
गोया कोइ दूसरा नहीं होता | ...मोमिन
त्रिलोचन, शमशेर, बलबीरसिंह‘रंग’नेभीहिन्दीग़ज़लोंकोआयामदिए |
परन्तुआधुनिकखड़ीबोलीमेंहिन्दी-गज़लकेप्रारम्भकाश्रेयदुष्यंतकुमारकोदियाजाताहैजिन्होंनेहिन्दीभाषामेंगज़लेंलिखकरगज़लकेविषयभावोंकोराजनैतिक, संवेदना, व्यवस्था, सामाजिकचेतनाआदिकेनएनएआयामदिए |... दुष्यंतकुमारकीएकगज़लदेखिये....
कहाँ तो तय था चरागां हरेक घर के लिए
कहाँ चराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिए ।
इस प्रकार फारसी ग़ज़ल, फारसी से हिन्दवी, दक्खिनी हिन्दी में आई तत्पश्चात उर्दू में आई एवं पुनः उर्दू से हिन्दी व हिन्दी की समस्त बोलियों के साथ खड़ी बोली एवं सभी भारतीय देशज भाषाओं में प्रचलित हुई |
वस्तुतःहिन्दीभाषानेअपनेउदारचेतास्वभाववशउर्दू-फारसीकेतमामशब्दोंकोभीअपनेमेंसमाहितकिया, अतःआजकेअद्यतनसमयमेंहिन्दीकवियोंनेभीग़ज़लकोअपनाया वसमृद्धकियाहै| हिन्दीगजलकेपासअपनीविराटशब्द-संपदाहै, मिथकहैं, मुहावरे, बिम्ब, प्रतीक, वरदीफ-काफियेहैं।आज हिन्दी-गजलमेंपारम्परिकगजलकीकाव्य-रूढ़ियोंसेमुक्तहोनेकाप्रयासहैतथानएशिल्पऔरविषयकेउत्तरोत्तरविकासकाभी| फलस्वरूपआजगज़लवहिन्दी-गज़लमेंविषयोंवग़ज़लकारोंकाएकविराटरचनासंसारहैजोप्रकाशितपुस्तकों, पत्रिकाओं, रचनाओंएवंअंतर्जाल( इंटरनेट) परप्रकाशनद्वारासमस्तविश्वमेंफैलाहुआहैतथाजोउर्दूगज़ल, हिन्दीग़ज़ल, शुद्धखड़ी-बोली, हिन्दीएवंहिन्दीकीसह-बोलियोंकेशुद्धवमिश्रितरूपोंसेसमस्तशायरी-विधावग़ज़लकोसमर्थव समृद्धकररहे है तथादिनबदिनग़ज़लमेंगीतिका, नईग़ज़ल, त्रिपदा-अगीत ग़ज़ल आदिनामसेनए-नएप्रयोगभीहोरहेहैं|
मेरे विचार से हिन्दीग़ज़लकेलिएएकजरूरीबातयहहैकिहिन्दीव्याकरणकीपरिधिमेंशब्दोंकाविभाजनहोऔरमात्राकीगणनाभी, ताकिग़ज़लकेशिल्पऔरकथ्यमेंतारतम्यरहसके| उर्दूज़बानकाहिन्दीगज़लपरहावीहोनाउसकेस्वरूपकेनिखारमेंबाधकहै।हिन्दीकीअनेकगज़लेंतोलगतीहैंजैसेवे उर्दू की हैं उनमें हिन्दी की वह अपनीसोंधी-सोंधीसुगंधहैही नहीं एवं वह अरबी-फारसीकेलफ्जोंसेदबकररहगईहै। हिन्दी की एक शुद्ध ग़ज़ल का हिस्सा देखिये...
छटा का कौन आकर्षण तिमिर में खींच लाया है
क्षितिज से व्योम में कोइ तरल तारा निकलता है | ...त्रिलोचन शास्त्री
साहित्य सत्यं शिवं सुन्दर भाव होना चाहिए ,
साहित्य शुचि शुभ ज्ञान पारावार होना चाहिए |
ललित भाषा ललित कथ्य न सत्य तथ्य परे रहे ,
व्याकरण शुचि शुद्ध सौख्य समर्थ होना चाहिए |.....डा श्याम गुप्त
यदिहिन्दुस्तानी भाषा के अनुरूप हिन्दी में घुलमिलगएउर्दूकेलफ्ज़ोंकाइस्तेमाल हो जो सहज ही आजायें तो सौन्दर्य, प्रभाव व सम्प्रेषण की स्पष्टता बढ़ सकती है | यथा एक ग़ज़ल देखें ....
वो हारते ही कब हें जो सजदे में झुक लिए
यूं फख्र से जियो यूंही चलती रहे ये ज़िंदगी | ---डा श्याम गुप्त
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चूँकिगज़लमूलतः उर्दू सेहिन्दीमेंआईहैइसलिएयहमानलेनाकि उसमेंउर्दूकेकुछलफ्ज़ अवश्य हों उचित नहीं। अतः मेरे विचार में फ़ारसी, औरउर्दूकेक्लिष्टशब्दोंसेपरहेज़करनाहीउचित है | उदाहरणार्थ ऐसे उर्दू/फारसी शब्दों के प्रयोग का क्या लाभ जिसे हिन्दी वाले तो क्या उर्दू भाषी भी न समझ पायें.---..उदाहरणार्थ......
तहज़ीबोतमद्दुनहैफ़कतनामकेलिए
गुमहोगईशाइस्तगीदुनियाकीभीड़में ----कुँवरकुसुमेश
आजकल देखा जा रहा है कि हिन्दी ग़ज़ल में उर्दू शब्दों व व्याकरण का दबदवा बढाने व कायम रखने के प्रयास किये जारहे हैं, तर्क उस्ताद-परम्परा, ग़ज़ल-ज्ञान, उर्दू-परम्परा आदि के दिए जारहे हैं| वास्तव में आज के कुछ कवि शायर जिनका भाषा व वैयाकरण ज्ञान अल्प है, विषय आदि पर अपना कुछ मौलिक ज्ञान भी नहीं है उर्दू उस्तादों का तौर-तरीका व उन्हीं की नक़ल की लीक पर चलकर आगे बढ़ना चाहते हैं| यह हिन्दी ग़ज़ल के लिए एवं स्वयं ग़ज़ल के विकास व निखार में बाधक है अतः हिन्दी ग़ज़ल के पैरोकार उर्दू-फारसी ग़ज़ल या उस्तादी परम्परा, या उर्दू भाषा व शब्दों आदि को अधिक तवज्जो न देकर आचार्य भामह के स्व-अनुभव के कथ्यांकन पर चलते हुए आगे बढ़ रहे हैं|आखिर हिन्दी ग़ज़ल क्यों उर्दू के नियम कायदों पर ही चले | हिन्दी की अपनी स्वयं की मर्यादा है, मिजाज़ है, नीति-नियम है, विशिष्टता है, गति है, कला व भाव का अपना स्वरुप अर्थवत्ता व प्रभामंडल है | तुलसी ने जब संस्कृत की बजाय भाखा ( हिन्दी ) में रामचरित मानस रची तब भी काशी के पंडितों ने तमाम सवाल उठाये थे |
शायर ज़हीर कुरैशी (डा आज़म की पुस्तक --आसान अरूज़ की समीक्षा में) का विचार है कि बुनियादी कायदे क़ानून आवश्यक हैं, आवश्यक नहीं आप अरूज़ के माहिर बन जाएँ | इल्मे अरूज़ अर्थात शेर की बाहरी संरचना का महत्त्व सिर्फ २५% है तथा शेरो की आतंरिक संरचना का ७५%..जिसमें शायर के कथ्यांकन, भाव, विचार, विषय, संवेदना, कल्पनाशीलता, ज्ञान आदि रहते हैं|
नचिकेताका मानना है कि "हिन्दी ग़ज़ल, उर्दू ग़ज़लों की तरह न तो असंबद्ध कविता है और न इसका मुख्य स्वर पलायनवादी ही है, इसका मिजाज समर्पणवादी भी नही है !" फैज़ अहमद फैज़ने तो इतना तक कह डाला है कि "ग़ज़ल को अब हिन्दी वाले ही ज़िंदा रखेंगे, उर्दू वालों ने तो इसका गला घोंट दिया है !"
मेराउर्दूभाषाज्ञानउतनाहीहैजितनाकिसीआमउत्तर-भारतीयहिन्दीभाषीका | मुग़लसाम्राज्यकीराजधानीआगरा (उ.प्र.) मेराजन्मवशिक्षास्थलरहाहैजहांकीसरकारीभाषाअभीकुछसमयतकभीउर्दूहीथी | अतःवहाँकीजन-भाषावसाहित्यकीभाषाभीउर्दू-हिन्दीबृजमिश्रितहिन्दीहै | इसीक्षेत्रकेअमीरखुसरोनेसर्वप्रथमउर्दूवहिन्दवीमेंमिश्रितगज़ल-नज्मेंआदिकहनाप्रारम्भकिया | अतःइसकृतिमेंअधिकाँशगज़लें,उर्दू-हिन्दीमिश्रितवकहीं-कहींबृजभाषामिश्रितहैं | कहीं-कहींउर्दूगज़लेंवहिन्दीगज़लेंभीहैं |
मुझेगज़लआदिकेशिल्पकाभीप्रारंभिकज्ञानहीहै | अरूज़--बहर, वज्न, रुक्न, टुकड़े, सबव, वतद, मज़मूअ, तक्तीअआदिकाज्ञाननहींकेबराबरहीहै | जबमैंनेविभिन्नशायरोंकीशायरी—गज़लेंवनज्मेंआदिसुनी-पढींवदेखींविशेषतयागज़ल...जोविविधप्रकारकीथीं..बिनाकाफिया, बिनारदीफ, वज्नआदिकाउठनागिरनाआदि ...तोमुझेख्यालआयाकिबहरों-नियमोंआदिकेपीछेभागनाव्यर्थहै, बसलयवगतिसेगातेचलिए, गुनगुनातेचलिएगज़लबनतीचलीजायगी, जोकभीमुरद्दसगज़लहोगीयामुसल्सल याहमरदीफ, कभीमुकद्दसगज़लहोगीयाकभीमुकफ्फागज़ल, कुछफिसलतीगज़लेंहोंगीकुछभटकतीग़ज़ल | हाँलयगतियतियुक्तगेयतावभाव-सम्प्रेषणयुक्तता तथासामाजिक-सरोकारयुक्तहोनाचाहिएऔरआपकेपासभाषा, भाव, विषय-ज्ञानवकथ्य-शक्तिहोना चाहिए | यहबातगणबद्धछंदोंकेलिएभीसचहै |जैसा कि स्वयंभामह नेदूसरों की रचना, देखकर-पढ़कर, काव्यज्ञान की उपासना करते हुए काव्य-निर्माण में प्रवृत्त होने का भी विधान कियाहै| ... तोकुछशे’रआदिजेहनमेंयूंचलेआये.....
“मतलाबगैरहोगज़ल, होरदीफभीनहीं,
यहतोगज़लनहीं, येकोइवाकयानहीं |
लयगतिहोतालसुरसुगम, आनंदरसबहे,
वहभीगज़लहै, चाहे कोईकाफियानहीं | “
बसगाते-गुनगुनातेबिगड़ती-संभलती-फिसलती-भटकती जोगज़लेबनतींगयीं... जिनमें त्रिपदाग़ज़ल...‘त्रिपदा-अगीतगज़ल’, आदिकुछनएप्रयोगभीकियेगएहै.. यहाँपेशहैं...मुलाहिजाफरमाइए........
“मुलाहिजाफरमाइए, होसकेतोगुनगुनाइए |
फूलयापत्थर, जिसपेजोहो, बरसाइये || “
------डाश्यामगुप्त








