Quantcast
Channel: सृजन मंच ऑनलाइन
Viewing all 512 articles
Browse latest View live

कलम से..: लव जिहाद और आईने का सच (कहानी) - सुधीर मौर्य


अगीत साहित्य दर्पण... की समीक्षा ---हिन्दी प्रचारक पत्रिका वाराणसी ----डा श्याम गुप्त

$
0
0

अगीत साहित्य दर्पण... की समीक्षा ---हिन्दी प्रचारक पत्रिका वाराणसी ----डा श्याम गुप्त


                                  
                       मेरे लक्षण ग्रन्थ -----अगीत साहित्य दर्पण.... अगीत साहित्य का छंद विधान व शास्त्रीय पक्ष की समीक्षा ---हिन्दी प्रचारक पत्रिका , वाराणसी में ......


गुरुवासरीय काव्य गोष्ठी २८-५-१५.... डा श्याम गुप्त ...

$
0
0


                              
                               साप्ताहिक गुरुवासरीय काव्य गोष्ठी दी.२८-५-१५ को डा श्याम गुप्त के आवास , सुश्यानिदी , के-३४८, आशियाना कोलोनी, लखनऊ पर संपन्न हुई | 
                 घनाक्षरी छंदों में  वाणी वन्दना से गोष्ठी का प्रारम्भ करते हुए डा श्याम गुप्त ने सातवें दशक में काव्य एवं गीत की दिशाहीनता की एतिहासिक पृष्ठभूमि पर प्रकाश डालते हुए अतुकांत कविता में अगीत के  प्रादुर्भाव एवं आगे बढ़ने पर तथा गीत के नए कलेवर नवगीत के प्रादुर्भाव पर चर्चा कीएवं अपना अगीत-गीत सुनाया--
मीत तुम गाओ  न गाओ अगीत हम गाकर रहेंगे |
मीत  मानो  या न मानो , छंद भावों में सजेंगे |

               श्री डा रंगनाथ मिश्र सत्य, श्री शीलेन्द्र चौहान, श्रीमती सुषमागुप्ता, रामदेव लाल विभोर, डा सुरेश प्रकाश शुक्ल, डा अखिलेश , श्री श्याम जी श्रीवास्तव, रवीन्द्र अनुरागी, मधुकर अस्थाना, श्री दुबे , श्री कृपाशंकर विश्वास, श्री अग्निहोत्री एवं डा श्याम गुप्त ने काव्य पाठ किया |

सुषमा गुप्ता काव्यपाठ करते हुए
श्री श्याम जी श्रीवास्तव का गीत
                उपस्थित कवियों द्वारा गंगा दशहरा, मानव आचरण एवं सामाजिक सरोकार के  विभिन्न विषयों पर गीत , गज़लें ,घनाक्षरी, सवैया  छंद , अगीत , नवगीत प्रस्तुत किये गए |
             श्रीमती सुषमा गुप्ता ने अपने उद्बोधन गीत द्वारा कवियों को नारियों के मान-सम्मान के प्रति गीत लिखने को प्रेरित करते हुए कहा--
नारियों के मान के हित , जग उठे अभिमान नर में |
आत्म के सम्मान की इच्छा उठे हर एक मन में |

            श्री अग्निहोत्री जी ने अपने गद्य में लिखे जाने वाले काव्य 'महाभारत'के अंश प्रस्तुत किये | डा रंगनाथ मिश्र सत्य ने समापन काव्यपाठ के साथ सभी कवियों के काव्य पाठ की  संक्षिप्त समीक्षा सहित भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए  आभार प्रकट किया |
डा श्याम गुप्त  काव्य पाठ करते हुए साथ में -डा सुरेश शुक्ल, मधुकर अस्थाना, रामदेव लाल विभोर, डा श्याम गुप्त, शीलेन्द्र चौहान, डा रंगनाथ मिश्र सत्य,व डा अखिलेश
रवीन्द्र अनुरागी का काव्य पाठ --श्री


.दुबे, डा श्याम गुप्त, शीलेन्द्र चौहान, डा सत्य, डा अखिलेश, कृपाशंकर विश्वास ,श्याम जी श्रीवास्तव, रवीन्द्र अनुरागी
डा सुरेश शुक्ल का काव्य पाठ
संचालन श्री मधुकर अष्ठाना द्वारा किया गया | धन्यवाद ज्ञापन  श्रीमती सुषमा गुप्ता द्वारा किया गया |

मेरी पहली दोस्त

$
0
0
जब हुआ मेरा सृजन,
माँ की कोख से|
मैं हो गया अचंभा,
यह सोचकर||

कहाँ आ गया मैं,
ये कौन लोग है मेरे इर्द-गिर्द|
इसी परेशानी से,
थक गया मैं रो-रोकर||

तभी एक कोमल हाथ,
लिये हुये ममता का एहसास|
दी तसल्ली और साहस,
मेरा माथा चूमकर||

मेरे रोने पर दूध पिलाती,
उसे पता होती मेरी हर जरूरत|
चाहती है वो मुझे,
अपनी जान से  भी बढ़कर||

उसकी मौजूदगी देती मेरे दिल को सुकून,
जिसका मेरी जुबां पर पहले नाम आया|
पहला कदम चला जिसकी,
उंगली पकड़कर||

http://hindikavitamanch.blogspot.in/2015/05/blog-post_13.html

"ज्येष्ठ पूर्णिमा-सन्तकबीर और नागार्जुन" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

$
0
0

     आज ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा है। आज के ही दिन दो महान विभूतियों का जन्म हमारे भारत वर्ष में हुआ था। जिनमें एक सन्त कबीर थे और दूसरे जनकवि बाबा नागार्जुन थे। सन्त कबीर एक समाज सुधारक थे और उनके नाम पर आज कई मठ बने हैं और उनमें मठाधीशों आधिपत्य है। जबकि बाबा नागार्जुन के नाम के जुड़ा न कोई मठ है और न कोई मन्दिर है। उनकी यही विशेषता उनको दूसरों से अलग करती है।

मैं उन सौभाग्यशाली व्यक्तियों में से हूँ जिसे बाबा की सेवा और सान्निध्य मिला था।
बाबा नागार्जुन को शॉल भेंट करते हुए डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’
सनातन धर्मशाला, खटीमा में 9 जुलाई,1989 को सम्पन्न 
कवि गोष्ठी के चित्र में-गम्भीर सिंह पालनी, जवाहरलाल वर्मा, 
दिनेश भट्ट, बल्लीसिंह चीमा, वाचस्पति, कविता पाठ करते हुए
ठा.गिरिराज सिंह, बाबा नागार्जुन तथा ‘डा. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
सन् 1989 का जून जुलाई का महीना मेरे जीवन के लिए
आज भी अविस्मरणीय  है!
बाबा नागार्जुन को स्कूटर पर बैठाकर सैर कराना! 
बाबा के साथ घंटों बतियाना!
कुछ अपनी कहना और कुछ उनकी सुनना!
बाबा के पास लोगों के मिलने का ताँता लगा रहता था!
सारा परिवार बाबा के साथ बहुत खुश रहता था!
मेरे पिता जी श्री घासीराम आर्य 
और दोनों पुत्रों के साथ बाबा घूम भी लेते थे!
बच्चों से तो बाबा बहुत घुल-मिल जाते थे!
इस दौरान कई कवि गोष्ठिया भी 
बाबा के् सम्मान में आयोजित की गईं!
बाबा को शॉल और मालाओं से 
सम्मानित भी तो किया गया था!
मुझे आज भी याद है कि खटीमा बस स्टेशन पर
मैं ही बाबा को दिल्ली की बस में बैठाने आया था!
यह है बाबा का पत्र मेरे नाम
जो उन्होंने दिल्ली से मुझे लिखा था!
 आर्य समाज के बारे में बाबा का क्या मत था!
यह आलेख मैंने "उत्तर-उजाला"में लिखा था!
जनकवि और साहित्यकार
बाबा नागार्जुन को मैं 
उनके जन्मदिन पर
कोटि-कोटि नमन करता हूँ!

जीवन परिचय

   बाबा के नाम से प्रसिद्ध कवि नागार्जुन का जन्म ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा(30 जून 1911) को अपने ननिहाल सतलखाजिला दरभंगाबिहार में हुआ था। आपका मूल नाम वैद्यनाथ मिश्र था। नागार्जुन तरौनी गाँवजिला मधुबनीबिहार के निवासी रहे। आपकी प्रारंभिक शिक्षा स्थानीय संस्कृत पाठशाला में हुई। बाद में  वाराणसी और कोलकाता में अध्ययन किया।1936 में आप श्रीलंका चले गए और वहीं बौद्ध धर्म की दीक्षा ग्रहण की।  कुछ समय श्रीलंका में ही रहे फिर 1938 में  भारत लौट आए। अपनी कलम से आधुनिक हिंदी काव्य को और समृद्ध करने वाले नागार्जुन का नवम्बर सन्1998 को ख्वाजा सरायदरभंगाबिहार में निधन हो गया।
नागार्जुन का साहित्य सृजन
फक्कड़पन और घुमक्कड़ी प्रवृति  नागार्जुन के जीवन की प्रमुख विशेषता रही कि उन्होंने अपनी रचनाएँ हमेशा घूम-घूमकर ही लिखीं हैं और उस स्थान विशेष का जीवन्त चित्रण अपने काव्य में किया है। कैलाश मानसरोवर में बाबा गये और वहाँ के परिवेश का जो वर्णन उन्होंने किया वह अद्भुत है बाबा को नमन करते हुए उनकी कालजयी रचना को प्रस्तुत कर रहा हूँ-
"अमल धवल गिरि के शिखरों पर
बादल को घिरते देखा है।

छोटे-छोटे मोती जैसे
उसके शीतल तुहिन कणों को
मानसरोवर के उन स्वर्णिम
कमलों पर गिरते देखा है
बादल को घिरते देखा है।

तुंग हिमालय के कंधों पर
छोटी-बड़ी कई झीलें हैं
उनके श्यामल-नील सलिल में
समतल देशों से आ-आकर
पावस की ऊमस से आकुल
तिक्त-मधुर बिस-तंतु खोजते
हंसों को तिरते देखा है
बादल को घिरते देखा है।

ऋतु वसंत का सुप्रभात था
मंद-मंद था अनिल बह रहा
बालारुण की मृदु किरणें थीं
अगल-बगल स्वर्णाभ शिखर थे
एक-दूसरे से विरहित हो
अलग-अलग रहकर ही जिनको
सारी रात बितानी होती
निशाकाल से चिर-अभिशापित
बेबस उस चकवा-चकवी का
बंद हुआ क्रंदनफिर उनमें
उस महान सरवर के तीरे
शैवालों की हरी दरी पर
प्रणय-कलह छिड़ते देखा है
बादल को घिरते देखा है।

दुर्गम बर्फ़ानी घाटी में
शत्-सहस्र फुट ऊँचाई पर
अलख नाभि से उठने वाले
निज के ही उन्मादक परिमल
-के पीछे धावित हो-होकर
तरल तरुण कस्तूरी मृग को
अपने पर चिढ़ते देखा है
बादल को घिरते देखा है" 
         1935 में दीपक (मासिक) तथा 1942-43 में  विश्वबंधु  (साप्ताहिक) पत्रिका का संपादन किया। अपनी मातृभाषा मैथिली में वे यात्री नाम से रचना करते थे। मैथिली में नवीन भावबोध की रचनाओं का प्रारंभ उनके महत्त्वपूर्ण कविता-संग्रह, 'चित्रसे माना जाता है। नागार्जुन ने संस्कृत तथा बांग्ला में भी काव्य-रचना की है।
    लोकजीवनप्रकृति और समकालीन राजनीति उनकी रचनाओं के मुख्य विषय रहे हैं। विषय की विविधता और प्रस्तुति की सहजता नागार्जुन के रचना संसार को नया आयाम देती है। छायावादोत्तर काल के वे अकेले कवि हैं जिनकी रचनाएँ ग्रामीण चौपाल से लेकर विद्वानों की बैठक तक में समान रूप से आदर पाती हैं। जटिल से जटिल विषय पर लिखी गईं उनकी कविताएँ इतनी सहजसंप्रेषणीय और प्रभावशाली होती हैं कि पाठकों के मानस लोक में तत्काल बस जाती हैं। नागार्जुन की कविता में धारदार व्यंग्य मिलता है। जनहित के लिए प्रतिबद्धता उनकी कविता की मुख्य विशेषता है।
    नागार्जुन ने छन्दबद्ध और छन्दमुक्त दोनों प्रकार की कविताएँ रचीं। उनकी काव्य-भाषा में एक ओर संस्कृत काव्य परम्परा की प्रतिध्वनि है तो दूसरी ओर बोल-चाल की भाषा की रवानी और जीवन्तता भी। पत्रहीन नग्न गाछ (मैथिली कविता संग्रह) पर उन्हें  साहित्य अकादमी पुरस्कार प्रदान किया गया। उन्हें उत्तर प्रदेश के  भारत-भारती पुरस्कारमध्य प्रदेश के मैथिलीशरण गुप्त पुरस्कार और बिहार सरकार के राजेंद्र प्रसाद पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उन्हें दिल्ली की ̄हदी अकादमी का  शिखर सम्मान भी मिला।
उनकी प्रमुख काव्य कृतियाँ हैं -
युगधाराप्यासी पथराई आँखेंसतरंगे पंखों वालीतालाब की मछलियाँ,हजार-हजार बाहों वालीपुरानी जूतियों का कोरसतुमने कहा था,  आखिर ऐसा क्या कह दिया मैंने,  मैं मिलटरी का बूढ़ा घोड़ारत्नगर्भाऐसे भी हम क्या: ऐसे भी तुम क्यापका है कटहल,  भस्मांकुर ।
बलचनमारतिनाथ की चाचीकुंभी पाकउग्रताराजमनिया का बाबा,वरुण के बेटे जैसे उपन्यास भी विशेष महत्त्व के हैं।
आपकी समस्त रचनाएँ नागार्जुन रचनावली (सात खंड) में संकलित हैं।
साभार-भारतदर्शन साहित्यिक पत्रिका (रोहित कुमार हैप्पी)

कालजयी हैं -गीत t... डा श्याम गुप्त..

$
0
0




.                     गीत – कालजयी हैं ( डा श्याम गुप्त )
             आदि मानव ने जब खगवृंदों के कल-कंठों का गायन सुना होगा, नदियों-झरनों के नाद घोष में आत्मा की पुकार अनुभव की होगी, उन्मुक्त प्रकृति के प्रांगण में चांद-तारों की रोशनी में, फूलों की हंसी में सौंदर्य भाव बोध को आंकलित किया होगा, गीतों की वाणी तभी से थिरकने लगी होगी।वैदिक  ऋषियों का वचन है कि'तेने ब्रह्म हृदा य आदि कवये'- अर्थात  कल्प के प्रारंभ में आदि कवि ब्रह्मा के हृदय में वेद का प्राकट्य हुआ था।
        स्वर के आविर्भाव के साथ सृष्टि के सर्वाधिक भावुक प्राणी मानव ने मूक इंगितों के स्थान पर शब्दहीन ध्वन्यात्मक इंगितों, अर्थहीन ध्वनियों द्वारा प्रकृति के दृश्यों-रूपों से उत्पन्न भय मिश्रित रोमांच, सुखद आश्चर्यप्रद अनुभूति की मुग्धावस्था एवं उससे उत्पन्न श्रद्धा के स्व-भावों का स्वयं में ही अथवा आपस में सम्प्रेषण करना प्रारम्भ किया होगा | शिव के डमरूसे उत्पन्न स्वर-ताल व अक्षर एवंमाँ सरस्वती की वीणा ध्वनि सेउद्भूत वाणी के बैखरी रूप की उत्पत्तिपर उन्मुक्त प्रकृति के प्रांगण में चांद-तारों की रोशनी व फूलों की हंसी में सौंदर्य का भावबोध के साथ प्रकृति के विभिन्न स्वर—संगीत, खगवृंदों के कल-कंठों का गायन,नदी की कल कल कल, झरने की झर झर झर, मेघ की घनन घनन घन, तडित की गर्ज़न के अनुकरण द्वारा विभिन्न स्वरों में ताल–लय बद्धता के साथ प्रसन्नता, रोमांच, आश्चर्य, श्रद्धा का प्रदर्शन करने लगा होगा | निश्चय ही यही संगीतमय उत्कंठित स्वर गीत के प्रथम स्वर थे, जिन्हें बाद में गीत की निर्गीत या बहिर्गीत कोटि में रखा गया जैसे आजकल – तराना |  इस प्रकार मानवनेजबसर्वप्रथमबोलनाप्रारम्भकियाहोगातोवहगद्य-कथनहीथा, तदुपरांतगद्यमेंगाथा | अपनेकथनकोविशिष्ट, स्वपरआनन्ददायी, अपनीव्यक्तिगतप्रभावीवक्तृताशैलीबनानेएवंस्मरणहेतुउसे  सुर, लय, प्रवाह, गतिदेनेकेप्रयासमेंपद्यका, गीतकाजन्महुआ |
          माँ सरस्वती के कठोर तप स्वरुप ब्रह्मा द्वारा वरदान में प्राप्त पुत्र ‘काव्यपुरुष’ के अवतरण पर मानव मन में लयबद्ध एवं विषयानुरूप गीत का आविर्भाव हुआ | आदिरूप में लोकगीतों का आविर्भावपृथ्वी पर मानव जीवन के अस्तित्व के साथ ही हुआहोगा।सृष्टि के हर स्पन्दन में लय और संगीत विद्यमान है। नदियों की कल-कल, हवाओं की थिरकन, झरनों की अनुगूंज, भौरों की गुंजार, कोयल की तान, शिशुओं की मुस्कान, किसानों के श्रम, बादलों की गर्जन, दामिनी की चमक, पक्षियों की कलरव, आदि सबमें एक नैसर्गिक संगीत विद्यमान है। प्रकृति का यह आदिम संगीत मानव जीवन में ऊर्जा एवं ताजगी का संचार करतारहा है। प्रकृति के हर क्रिया-व्यापार में एक लय है और इस लय का भंग होना उथल-पुथल है, परिवर्तन है, जो प्राकृतिक आपदा के रूप में विनाश-महाविनाश भी होसकता है एवं परिवर्तन के रूप में प्रकृति का उन्नयन रूप भी |
               गीत,  काव्य की शायद सबसे पुरानी विधा है। गीत मनुष्य मात्र की भाषा है।महाकवि निराला नेगीतिका की भूमिका में कहा है - 'गीत-सृष्टि शाश्वत है। समस्त शब्दों का मूल कारण ध्वनिमय ओंकार है। इसी नि:शब्द - संगीत से स्वर-सप्तकों की भी सृष्टि हुई। समस्त विश्व,स्वर का पूंजीभूत रूप है।'  


        भारतीय गीतिकाव्य की परम्परा विश्व साहित्य में सबसे पुरातन है | ऋग्वेद के पूर्व भीगीत पूर्ण-परिपक्व व सौन्दर्यमय रहा होगा | वैदिक मन्त्रों में स्वर संबंधी निर्देश मिलने से एवं स्थान स्थान पर पुरा-उक्थों के कथन से यह प्रतीत होता है कि मौखिक गीत रचना परम्परा अवश्य रही होगी | मानव इतिहास के प्राचीनतम साहित्य ऋग्वेद में मानव इतिहास के सर्वप्रथम गीत पाए जाते हैं | वे गीत प्रकृति व ईश्वर के प्रति सुखद आश्चर्य, रोमांच एवं श्रद्धा भाव के गीत ही हैं | ऋषियों ने प्रकृति की सुकुमारिता व सौन्दर्य का सजीव चित्रण किया है जो भावमयता व अर्थग्रहण के साथ मनोज्ञ कल्पनाएँ हैं | ऋग्वेद ७/७२ में वैदिक कालीन एक प्रातः का वर्णन कितना सुन्दर व सजीव है  ---
“विचेदुच्छंत्यश्विना उपासः प्र वां ब्रह्माणि कारवो भरन्ते |
उर्ध्व भानुं सविता देवो अश्रेद वृहदग्नयः समिधा जरन्ते ||”  
     ----हे अश्वनी द्वय ! उषा द्वारा अन्धकार हटाने पर स्तोता आपकी प्रार्थना करते हैं (स्वाध्याय, व्यायाम, योग आदि स्वास्थ्य वर्धक कृत्य की दैनिक चर्या )| सूर्या देवता ऊर्ध गामी होते हुए तेजस्विता धारण कर रहे हैं | यज्ञ में समिधाओं द्वारा अग्नि प्रज्वलित हो रही है | ...तथा –
“एषा शुभ्रा न तन्वो विदार्नोहर्वेयस्नातो दृश्ये नो अस्थातु
अथ द्वेषो बाधमाना तमो स्युषा दिवो दुहिता ज्योतिषागात |
एषा प्रतीचि दुहिता दिवोन्हन पोषेव प्रदानिणते अणतः
व्युणतन्तो दाशुषे वार्याणि पुनः ज्योतिर्युवति पूर्वः पाक: ||”
----प्राची दिशा में उषा इस प्रकार आकर खड़ी होगई है जैसे सद्यस्नाता हो | वह अपने आंगिक सौन्दर्य से अनभिज्ञ है तथा उस सौन्दर्य के दर्शन हमें कराना चाहती है | संसार के समस्त द्वेष-अहंकार को दूर करती हुई दिवस-पुत्री यह उषा प्रकाश साथ लाई है, नतमस्तक होकर कल्याणी रमणी के सदृश्य पूर्व दिशि-पुत्री उषा मनुष्यों के सम्मुख खडी है | धार्मिक प्रवृत्ति के पुरुषों को ऐश्वर्य देती है | दिन का प्रकाश इसने पुनः सम्पूर्ण विश्व में फैला दिया है |
         ऋग्वेद में प्रकृति के अतिरिक्त उर्वशी-पुरुरवा, यम-यमी , इंद्र-सरमा, अगस्त्य-लोपामुद्रा, इंद्र-इन्द्राणी के रूप में विभिन्न भावों की सूक्ष्म व्यंजनायें, नारी ह्रदय की कोमलता, दुर्बलता, काम-पिपासा, आशा, निराशा, विरह वेदना सभी के संगीत-गीत की अभिव्यक्ति हुई है | यही सृष्टि के प्राचीनतम गीत हैं जिनकी पृष्ठभूमि पर परवर्ती काल में समस्त विश्व में काव्य का विकास हुआ, लोकगीतों-गीतों के
विविध भाव-रूपों में | यजु, अथर्व एवं साम वेद में इनका पुनः विक्सित रूप प्राप्त होता है | साम तो स्वयं गीत का ही वेद है यथा....ऋषि कहता है ...” 3म् अग्न आ याहि वीतये ग्रृणानो हव्य दातये |
नि होता सत्सि बर्हिषि || 
साम 1 .... हे तेजस्वी अग्नि (ईश्वर) आप ही हमारे होता हो, समस्त कामना  पूर्तिकारक स्त्रोता हो, हमारे ह्रदय रूपी अग्निकुंड ( यज्ञ ) हेतु आप ही गीत हो आप ही श्रोता हो |

          पौराणिक आख्यानों के अनुसार  भगवान विष्णु के वाहन गरुड़ के उड़ते समय उसके पंखों से सामवेद के मन्त्रों की रागमयी ध्वनि हुआ करती है। उनकी उड़ान की संगतियों एवं परों की गतियों की विभिन्न विधाओं आरोह, अवरोह, समानगति, समगति आदि की लयात्मक समन्वयता से विभिन्न छंद एवं राग उत्पन्न होते हैं |विष्णु, विश्व अणु अर्थात विश्व की क्रियाओं कलापों की लयात्मकता, जीवन की उड़ान के विभिन्न भाव-पथ ही गीत की उत्पत्ति के कारण-रूप हैं | जीवन के विभिन्न रस-भावों के अनुभव से गीत की उत्पत्ति होती है | यह लयात्मकता शब्द की उड़ान से उत्पन्न होती है | शब्द को गरुड़ माना गया है जो सुपर्ण अर्थात् ( काव्य रूपी ) सुन्दर पंखों वाला ( आह्लादक, आनंद प्रदायक है  ) है, जिसमें अप्रतिम सामर्थ्य है अमरावती ( भावाकाश- अंतर्मन-परा वाणी  ) से अमृत-कलश लाने की शक्ति ( परमानंद प्रदायक भाव उत्पन्न करने की ) से सम्पन्न है।
       'अपारे काव्यसंसारे कविरेव प्रजापति:'की सनातन मान्यता को जीते हुए, 'कविर्मनीषीपरिभूस्वयंभू'की उपनिषद् सूक्ति की प्रामाणिकता के प्रति श्रद्धायुत व्यक्ति ही गीत-रचना के समय ऋतम्भरा प्रज्ञा, औरवैखरी, मध्यमा तथा अपरा से ऊपर स्थित परा-वाणी से संयुक्त हो पता है | तभी गीति-चेतना सदानीरा नदी की भांति मानस में प्रवाहित होती है |
         वैदिक गीत स्वर-प्रधान थे| लौकिक संस्कृत में लयसाम्य और नाद-सौन्दर्य आधारित गीत परंपरा प्राप्त होती है | लौकिक काव्य परम्परा का श्रीगणेश आदिकवि बाल्मीकि से माना जाता है| यहीं से काव्य में वर्णानात्मकता के स्थान पर गीति-काव्यात्मकता का प्रवेश हुआ | विश्व की सर्वप्रथम मानवीय कथा उर्वशी-पुरुरवा की विरह कथा एवं क्रोंच वध की घटना के कारण आदिकवि में पीड़ा-संवेदना द्वारा उत्पन्न काव्य के कारण ही परवर्ती काल में काव्य में कवियों में  वियोगी होगा पहला कवि ...’ जैसी एकल धारणा बनी, जो पूर्ण सत्य नहीं है | वस्तुतः पूर्ण सत्य यही है कि प्रथम गीत/कविता प्रकृति के सुखद आश्चर्य मिश्रित रोमांच के कारण ही रची गयी एवं गीत में भावों व रसोद्द्वेगों की उत्सर्जना विभिन्न संवेदनाओं, सुख-दुःख, प्रेम, श्रृंगार, सौन्दर्य, आश्चर्य, शौर्य सभी गीतों में उद्भूत होती है |
        प्रारंभिक लौकिककाव्यमेंगीतकीअनिवार्यशर्तछंद एवं लयात्मकतारही है आदिकविवाल्मीकिसेलेकरअबतकगीतइसीरूपमेंपहचानाजातारहाहै।इसकेपूर्ववैदिकसाहित्यमेंऋग्वेदएवंसामवेदकीऋचाएं, जोगीतहीमानीजातीहैंलयबद्ध रचनाएँ ही हैं | उन ऋचाओंकीएकसुनिश्चितगायनपद्धतिनिर्धारितथी, जिसेआरोह-अवरोह-स्वरितकेनामसेचिन्हितकियागयाथा।अर्थातवहकेवल लयपरआधारितकाव्यथा।
        परवर्ती लौकिककाव्यमेंगीतकीशर्तेंछंदसंतुलनऔरअंत्यानुप्रास(तुकान्त)मानी गयीं   परन्तु लोकगायकों के लोकगीतों व जनकाव्य में स्वर की महत्ता आरोह-अवरोह-स्वरित बनी रही तथा मात्रा व वर्ण संख्या व तुकांत की कठोर अनिवार्यता नहीं थी |
        बादमेंसनातनगीतकीअनिवार्यशर्तलयकोसाधनेकेलिएछंदऔरतुकान्तकोसाधनबनायागया,जोसंस्कृतकाव्यकीवार्णिकछंदपरम्परातकबखूबीनिर्वाहकियाजातारहा।लेकिनहिन्दीकाव्यमें, मात्रिकछंदकेरुढ़प्रयोगऔरभाषाईजटिलताकेकारणयहछंदरूपीसाधनतोबनारहा, किन्तुसाध्यलयपीछेछूटतीगयी।यहस्पष्टहैकिवैदिकसाहित्यसेलेकरअद्यतननवगीततकलयहीएकमात्रज़रूरीशर्तरहीहैगीतकीऔरयहभी, किराग आधारित गेय गीततथामुद्रितगीतपाठकेबीचसम्बन्धका सेतुभीलयहीहै।
        स्वर, पद और ताल से युक्त जो गान होता है वह गीतकहलाता है। गीत, सहित्य की एक लोकप्रिय विधा है। इसमें एक मुखड़ा तथा कुछ अंतरे होते हैं। प्रत्येक अंतरे के बाद मुखड़े को दोहराया जाता है। गीत में एक ही भाव, एक ही विचार एक ही अवस्था का चित्रण होता है | लम्बे गीतों में भाव सौन्दर्य स्थिर नहीं रह पाता अतः वे संक्षिप्त ही होने चाहिए |
     गीत मन की मुक्तअवस्था की अभिव्यक्तिहै।आचार्य रामचन्द्र शुक्लने कविता की परिभाषा देते हुए लिखा है - 'जिस प्रकार आत्मा की मुक्तावस्था ज्ञानदशा कहलाती है उसी प्रकार हृदय की मुक्तावस्था रसदशा कहलाती है। हृदय की इसी मुक्तावस्था के लिए वाणी जो विधान करती है उसे कविता कहते हैं।'  गीतों की सबसे लोकप्रिय शैली लोकगीत है।'लोकगीत'का अर्थ है लोक परिवेश से जन्मा एवं वहीं की गायन शैली मे गाया जाने वाला गीत। यानी एक ऐसा गीत जो लोकरंग एवं लोकतत्वों को अपने में समाहित किए हो और लोककंठों द्वारा लोकधुनों में गाया जाए।  गीत मानव जीवन कास्वर है, मनुष्य की स्वयं तथा लोक पर जययात्रा का प्रारंभिक चरण ।पाश्चात्य दार्शनिक हीगेल ने गीत के सम्बन्धमे लिखा है - 'गीत सृष्टि की एक विशेष मनोवृत्ति होती है। इच्छाविचार और भाव उसके आधार होते हैं।'लोकगीतों में गेयता प्रमुख होती है।
      भगवतशरण उपाध्यायके विचार से गीतकाव्य की साधारण परिभाषा के अनुसार, गीत कविता की वह विधा है जिसमें स्वानुभूति प्रेरित भावावेश की आर्द्र और कोमल आत्माभिव्यक्ति होती है इसी सन्दर्भ में केदार नाथ सिंह कहतेहैं - 'गीत कविता का एक अत्यन्त निजी स्वर है ग़ीत सहज, सीधा, अकृत्रिम होता है।' तथा अमरकोश के अनुसार --सुस्वरं सरसं चैव सरागं मधुराक्षरं/ सालंकारं प्रमाणं च षडविधं गीतलक्षणं   महादेवी वर्माकी निगाह में साधारणतः गीत व्यक्तिगत सीमा में तीव्र दुख-सुखात्मक अनुभूति का वह शब्द-रूप है जो अपनी ध्वन्यात्मकता में गेय हो सके।
           भावों एवं विचारों के सुन्दर समन्वय के साथ-साथ गीतात्मकता का सही सन्तुलन सफल गीत रचनाकी अनिवार्यता है।छंदशास्त्रों के नियमों को ध्यान में रखकर भी गीत लिखे जाते हैं और उन्मुक्त गायन के भाषा से भी गीतों की रचना होती है।जीवनगत भावों से गहरे संबंधित होने के कारण गीतों की रचना-प्रक्रिया जटिल होती है। भावावेश के क्षणों में छंदों के शास्त्रीय बंधन आवश्यक नहीं रह जाते तथापि लयात्मकता एवं संगीतात्मकता का तत्व सतत् बना रहता है।खासकर लोकगीतों में तो यह धारा अविछिन्न बनी रहती है और छंद शास्त्र के अज्ञानी बने रहकर भी लोक कवि मस्ती में, अपनी धुन में गाए जाता है और अमृत रस का संचार किए जाता है।
       गीत संपूर्ण मानवीय संवेदना के सर्वोत्तम निचोड़ की सार्थक और संगीतात्मक अभिव्यक्ति है। गीत जब व्यक्तिपरक उद्गार बन जाता है तब भी वह समाज के सामूहिक संवेग का ही प्रतिनिधित्व करता है, इसलिए गीत का मर्म वही समझ सकता है जो उसकी आत्मपरकता में अंतर्निहित मानवीयता की आवाज से भिज्ञ हो | डा नगेन्द्र के अनुसार --- “गीत वास्तव में काव्य का सबसे तरल रूप है व वाणी का द्रव है क्योंकि इसका माध्यम स्वर है जबकि छंद का लय ..”
         गीत की सबसे बड़ी अनिवार्यता उसकी लय है, उसमें विद्यमान गेयता है।निराला ने कविता को छन्दों के बन्धन से मुक्तहोने का जो कार्य किया है वह भी एक आवश्यकता थी। लेकिननिराला ने कविता में अन्त:संगीत की अनिवार्यता को भी नहीं नकारा। निराला-रचित मुक्तछंद की कविताओं में अन्त:गीत-संगीत सर्वथा विद्यमानहै। इसी भाव पर डा रंगनाथ मिश्र सत्य द्वारा सातवें दशक में स्थापित अगीत कविता भी अपनी स्वर-लयबद्धता सहित अन्तः संगीत-गीत से आप्लावित है |              
      कुछ विद्वानों द्वारा  गीति और गीतको एक मानने से भ्रम की स्थित उपन्न हुई है|गीतिपद्य-काव्य विधा है जिसमें संगीत, अनुभूति और रस का संगम रहता है, यह एक व्यापक अवधारणा है, जिसमें गीत, अनुगीत, समगीत, प्रगीत, गीतिका, अगीतआदि सब समाये होते हैं 
         समकालीन गीतिकाव्य : संवेदना और शिल्प में लेखक डॉ.रामस्नेही लाल शर्मा यायावरगीत का ज़िक्र करते हुए कहते हैं कि गीतकिसी कथात्मकता का मोहताज नहीं होता. वह भाव केंद्रित होता है,
उसकी गेयता संगीतमय भी होती है और संगीत रहित भी|  वह प्रसंग निरपेक्ष स्वत: पूर्ण, भाव प्रवण, टेक आधारित, वैयक्तिक, युगीन यथार्थ से प्रभावित तथा अनेक उपरूपों में बुना हुआ होताहै |
गीत केविषय-वस्तु एवं रस-प्रधानता  आधारित कई भेद होते हैं- श्रृंगार गीत, वीर रस के गीत, करुणासिक्त गीत, देशप्रेम के गीत, छायावादी, रहस्यवाद के गीत,निर्वेद के गीत, प्रगतिशील गीत, विजय- गीत, युद्ध-गीत आदि | प्रगीत का अर्थ है गीति काव्य| सांस्कृतिक भ्रमवश गीत और प्रगीत में अंतर नहीं माना जाता, प्रगीत मेंलयात्मकता शब्दों एवं कवि व गायक के हाव-भाव, प्रस्तुतीकरण से आती है और वाद्यों के बिना ही संगीत फूटता है| प्रगीत में सौन्दर्य शब्दों के तत्वों से आता है,जबकि गीत मेंयहसंगीत की शास्त्रीयता से पैदा होता |  प्रगीत युग बोध पर आत्मानुभूति और वैयक्तिकता को वरीयता देताहै, वह टेक अंतरा आदि का कट्‌टर अनुयायी नहीं होता |  गीत की जीवन में व्याप्ति सर्वाधिक है|
          इस प्रकार  गीत की मूल विशेषताएंहै --- १.कवि की भावना की पूर्ण व व्यापक अभिव्यंजना ..२.स्वतः स्फुरणा एवं भावावेशयुत अवस्था...३.एक पद में एक ही भाव की विवृत्ति ..४.संगीतात्मकता एवं ५. निर्बन्धता | 
        गीत, प्रत्येक युग में मनुष्य के साथी रहे हैं। लोकजीवन अगर कहीं अपने नैसर्गिक रूप में आज भी सुरक्षित है तो वह है गीतों में। जब तक लोक रहेगा एवं लोक जीवन रहेगा तब तक गीतों में लोकजीवन का स्पन्दन विद्यमान रहेगा एवं भविष्य में जब कभी भी सरस कविताओं की बात होगी तो उसमें गीतों का स्थान सर्वोपरि रहेगा।


        आधुनिक युग में गीतों के भविष्य के बारे में प्रश्न चिन्ह लगाए जाते रहे हैं | परन्तु प्रश्न उठाने वाले भूल जाते हैं कि मानव की मूलवृत्ति में प्रेम, श्रृंगार, पीड़ा आदि भाव हैं, जब तक प्रकृति में सौंदर्य है,जगत में संवेदना का प्रवाह है, तब तक गीतों का अस्तित्व विद्यमान रहेगा। यह बात पृथक है की गीत युगानुसार अपना स्वरुप बदलते रहे हैं सजग रचनाकार सदैव परिष्कार और नवता के प्रति आग्रहशील रहते हैं यह साहित्य व काव्य का धर्म भी है | सृजनशील व्यक्ति प्रयोगशील होता है | कवि की प्रतिभा एक पूर्व निश्चित ढाँचे में संतुष्टि नहीं पाती, वह नूतन आयामों को खोजकर अभिव्यक्ति के नवीन शिल्पों, भावों, विधानों व कथावस्तु में तृप्ति पाती है|  सच्चे साहित्यकार परम्परा एवं नव-प्रयोग के सामंजस्य से आगे बढ़ते हैं | आदिकाल से अधुनातन युग तक काव्य में प्रवृत्यात्मक परिवर्तन निरन्तर होता रहा है, लोकप्रियता के आधार पर कभी किसी एक काव्यरूप को प्रमुखता मिली तो कभी दूसरे को किन्तु गीत और गीतेतर कविता का विवाद इसी शताब्दी के पाँचवे दशक की उपज है।यह टकराव भी तथाकथित छांदसिक और अछांदसिक काव्य रूपों के बीच अधिक है जो केवल तुकांत छंदों को छंद समझने के भ्रम व  अज्ञान के कारण है ।भरत ने अत्यंत व्यापक रूप में वाक् तत्व को शब्द और
काल तत्व को छन्द कहा है.....“छन्दहीनो न शब्दोSजस्त नच्छन्द शब्दवजजातम्।-----अर्थात कोई शब्द या ध्वनि  छन्द रहित  नहीं और न ही कोई छन्द शब्द रहित है क्योंकि ध्वनि काल के बिना व्यक्त नहीं होती काल का ज्ञान ध्वनि के बिना संभव नहीं |आज की मुक्तछंद कविता को कोई 'नई कविता` नहीं कहता।
           वैदिक गीत स्वर-प्रधान थे एवं छन्दों में वर्णानात्मकता प्रधान थे | लौकिक संस्कृत में लयसाम्य और नाद-सौन्दर्य युत छंद आधारित गीत परंपरा थी | लौकिक काव्य परम्परा से काव्य में वर्णानात्मकता के स्थान पर गीति-काव्यात्मकता का प्रवेश हुआ | परन्तु लय साधने हेतु गीतों व छंदों में तुकांत का प्रयोग सनातन परम्परा से प्रारम्भ हुआ| जो संस्कृत से हिन्दी में आने पर वार्णिक व मात्रिक छंद की रूढ़िवादिता के कारण धीरे-धीरे अप्रचलित होने लगी |  यद्यपि तुकांत वार्णिक व मात्रिक छंदों युत गीतों का प्रयोग महाकाव्यों की लम्बी कवितायें एवं शास्त्रीय काव्य में ही रहा | लोकगीतों में तुकांत की अनिवार्यता कभी पूर्ण रूप से स्थापित नहीं हुई अपितु केवल लय ही गीतों का मूलतत्व बना रहा | जो महादेवी, प्रसाद, सुमित्रानंदन पन्त आदि तक संक्षिप्त गीतों के रूप में चलती रही |
              वास्तव में छायावाद के पश्चात के युग में अर्थात सत्तर के दशक मेंसमाज की भांति साहित्य भी ठिठका हुआ था |  स्वतंत्रता के पश्चात साहित्य में अंग्रेज़ी साहित्य एवं अन्य विदेशी साहित्य के प्रभाववश एवं समाज में स्वतंत्र चेतना की उत्पत्ति परन्तु विशिष्ट साहित्यिक दिशा के बिना साहित्य भी समाज की भांति दिशाहीन था ? महाकाव्यों के काल में काव्य व गीत ग्रंथों के लिए या कवियों विद्वानों की अन्तः काव्य-गोष्ठियों हेतु लिखे जाते थे अथवा छोटे संक्षिप्त लोकगीत खेतों, समारोहों या विशिष्ट पर्वों आदि में गायन हेतु | खुली काव्य-प्रतियोगिताएं आदि भी कई कई दिन तक चलने वाली होती थें एवं उनमें महाकाव्यों, आल्हा, रामायण, महाभारत आदि की कथाओं के प्रसंग गाये जाते थे |  खुले मंच पर कवि सम्मलेन, गोष्ठियां आदि नहीं होती थी| अतः महादेवी-प्रसाद-पन्त  के संक्षिप्त भावसौन्दर्य प्रधान छायावादी गीतों के बाद, निराला के अतुकांत छंदों व गीतों की क्रान्ति के समय तक गीतों की महत्ता व उपादेयता स्पष्ट दिखाई देती रही | छायावादोत्तर युग में बच्चन, नीरज आदि के विलंवित लम्बे लम्बे गीतों के काल में, खुले मंच पर कविता व कवि सम्मेलनों के प्रादुर्भाव के कारण जिनमें लम्बे गीतों को सुनने का किसी के पास समय नहीं था अपितु मंच हेतु हलके-फुल्के काव्य, हास्य-कविता आदि के प्रादुर्भाव के साथ ही विभिन्न सामयिक वस्तु-विषयों का कविता में प्रवेश के कारण गीतों का प्रभाव कम हुआ|  कोई भी काव्य-चेतना यदि एक कालखंड से ही आबद्ध होकर रह जाए तो उससे आत्म-विकास ही अवरुद्ध नहीं होता, पूरे परिवेश की गतिशीलता से उसका परिचय भी छूट जाता है। यही कारण है कि रूढ़ गीत इस बिंदु पर जड़ीभूत हुआ परन्तु यह गीत की गतिशीलता एवं मृत्युंजय रूप ही है कि वह पारंपरिक रूप बनाए रहते हुए भी अतुकांत गीत विधा अगीत एवं तुकांत गीत विधा नवगीत के नए रूप में प्रतिष्ठित हुआ |
        यह भी कहा गया कि प्रगतिवादी और नई कविता के दौर में भी बच्चन और नीरज अपने गीतों की धूम मचाते रहे किन्तु परम्परा का विकास नहीं हो पाया।  इसका मूल कारण यही है कि वे लम्बे गीत थे| गीतों का लंबा होना एक दुर्गुण है इसमें भाव एक नहीं रह पाते और श्रोता भावों की भूलभुलैया में खोजाता है और भूल जाता है की वह क्या सुन रहा था |इनसभी कारणों से कविता जगत में विभिन्न प्रकार के आन्दोलनों का प्रवेश हुआ जो अकविता, नयी कविता, गद्यगीत, अतुकांत गीत एवं उसका संक्षिप्त रूप अगीत तथा तुकांत-गीत के संक्षिप्त रूप नवगीत का अवतरण हुआ | ग़ज़ल विधा के लोकप्रिय होने से भी गीतों की चमक पर प्रभाव पड़ा और यहाँ तक कहा जाने लगा कि ‘गीत मर गया’परन्तु इस सब के बाबजूद भी हिन्दी में लोक व पारंपरिक गीत परम्परा की अजस्र धारा निरंतर प्रवाहमान रही और आज भी प्रवाहमान है | परम्परा से हटकरतुकांत व अतुकांत गीतों की एवं कविता की नवीन धाराओं के रूप में अतुकांत गीत की धारा अगीतएवं तुकांत गीत की धारा नवगीतही आज जीवित हैं |अन्य सभी धाराएं काल के गाल में समा चुकी हैं|
        अगीतअतुकांत गीत का संक्षिप्त रूप है जो गीत की मुख्य शर्त लय पर ही आधारित सामायिक आवश्यकता – संक्षिप्तता एवं तीब्र भाव-सम्प्रेषण के आधार दोहे व शेर की तर्ज़ पर रचा गया है | अगीत का एक सुनिश्चित छंद विधान “ अगीत साहित्य दर्पण ( ले.डा श्यामगुप्त, प्रकाशक-अखिल भारतीय अगीत परिषद्, लखनऊ) प्रकाशित होचुका है एवं तुकांत गीति विधा के भांति ही इसके विभिन्न प्रकार के विविध छंद भी सृजित किये जाचुके हैं |  आज यह गीत की एक सुस्थापित विधा है |
       नवगीततो वास्तव में मूल रूप से गीत ही हैगीत के पारंपरिक रूप का पुनर्नवीनीकरण | गीत और नवगीत में काव्यरूपतामक अंतर नहीं है। यह कोईनवीनविधानात्मकतथ्यभी नहींहैअपितु 
पारंपरिकगीतकोहीमोड़-तोड़करलिखदियाजाताहै | इसमेंमूलतःतोतुकांतताकाहीनिर्वाहहोताहैऔर मात्राएँ भी लगभग सम ही होती हैं, कभी-कभीमात्राएँअसमानअतुकांतपदभीआजाताहै |  इसेगीतकासलादया  खिचडीभी  कहाजासकताहै | इसकास्पष्टतथ्य-विधानभीनहींमिलतातथा प्रायः कविअपनेनिजी (ज़्यादातरकाल्पनिक) अवसाद-आल्हादकोऐकान्तिकभावमेंगातादिखाईदेताहै | वस्तुतःयहहैपारंपरिकगीतहीजिसेटुकड़ोंमेंबाँटकरलिखदियाजाताहै | उदाहरणार्थ---- एकनवगीतका अंश है
जगनेजितनादिया
लेलिया/उससेकईगुना
बिनमांगेजीवनमें
अपनेपनका/जालबुना |
थोपागया
माथपरपर्वत 
हमनेकहाँचुना |          --मधुकरअस्थानाकानवगीत
            इसे  १२-१४  या  २६मात्राओं- वालासामान्य गीत की भाँति लिखाजासकताहै-
जगनेजितनादिया,     ११            
लेलियाउससेकईगुना | १५          
बिनमांगेजीवनमें,    १२
अपनेपनकाजालबुना |१४
        या                                                               
 जगनेजितनादिया, लेलियाउससेकईगुना,   २६                                                                        
बिनमांगेजीवनमें, अपनेपनकाजालबुना|   २६
टेक-  थोपागयामाथपर    १२   
     पर्वतहमनेकहाँचुना ||  १४    
           या      
   थोपागयामाथपरपर्वतहमनेकहाँचुना |  २६
 जगनेजितनादियालेलियाउससेकईगुना || २६ --------कुछ  अन्यउदाहरणदेखें ---
                                                                                                                  टुकड़ेटुकड़े / टूटजाएँगे   १६
मनकेमनके
दर्दहराहै    १६ = ३२
ताड़ोंपर / सीटीदेतीहैं 
गर्महवाएँ    २४
जलीदूब-सी तलवोंमेंचुभती /यात्राएँ       २४

पुनर्जन्मलेकरआतीहैं
दुर्घटनाएँ     २४
धीरे-धीरेढलजाएगा                                                          
वक्तआजतक
कबठहराहै?    ३२        ---- पूर्णिमावर्मनकानवगीत ..
         ------ सीधा -सीधा २४ /३२मात्राओंकापारंपरिकगीतहै ... इसेऐसेलिखिए....
ताड़ोंपरसीटीदेती  हैंगर्महवाएं ,   २४
जलीदूबसीतलवोंमेंचुभतीयात्राएं | २४
पुनर्जन्मलेकरआतीहैंदुर्घटनाएं |   २४
धीरेधीरेढलजाएगावक्तआजतक, कबठहराहै ,  ३२
टुकड़े-टुकड़ेटूटजायंगेमनकेमनके, दर्दहराहै  |  ३२
        कहने का अर्थ है कि गीत आज भी जीवित है,अपने पारंपरिक रूप में भी एवं विविध नवीन रूपों में भी | वर्तमान में श्री जगमोहनलाल कपूर ‘सरस, नन्दकुमार मनोचा, विनोद चन्द्र पांडे ‘विनोद’, शिव भजन ‘कमलेश’, रामाश्रय सविता, डा अपर्णा चतुर्वेदी, सुषमा सौम्या, बालसोम गौतम, शीलेन्द्र चौहान, डा रंगनाथ मिश्र सत्य, डा योगेश गुप्त, मधुकर अष्ठाना, रामदेव लाल विभोर, निर्मल शुक्ल, श्यामकिशोर श्रीवास्तव आदि अनेकों गीतकार अपने गीतों से सरस्वती का भण्डार भर रहे हैं|  भविष्य में या साहित्य के इतिहास में जब कभी लयबद्ध या तुकांत सहज, सुरुचिपूर्ण गेय साहित्य, छंदों या कविता की बात होगी तो गीतों-लोकगीतों का नाम सर्वोपरि रहेगा एवं गीत के दोनों नवीन रूपों अगीत एवं नवगीत का भी महत्वपूर्ण उल्लेख अवश्य किया जाएगा | सजग रचनाकार सदैव परिष्कार और नवता के प्रति आग्रहशील रहे हैं, अभिव्यक्ति के हिसाब से परिष्कृत रचना ही साहित्य में स्थान बना पाती है|  पारम्परिक गीतों से गीत के इन नये स्वरूपों की समन्वित पहचान बनी | यही कारण है, कि गीत के मर जाने की घोषणा का गीत के नये प्रारूपों, अगीत व नवगीत, दोनों विधाओं नेन केवल प्रतिकार व जोर शोर से विरोध कियाअपितु स्वयं को सक्षम व प्रभावशाली रूप में साहित्य व समाज के सम्मुख विस्तृत रूप में प्रस्तुत किया |
          आज यदि हम किसी पत्रिका या पत्र या अंतरजाल पत्रिकाओं या अंतरजाल पर चिट्ठों ( ब्लोग्स-आदि ) को उठाकर देखें तो विविध रूप में कविताओं आदि के साथ साथ गीत अपने विविध रूप रंगोंयथा - प्राचीन गीत, आधुनिक गीत, वैयक्तिक गीत, राष्ट्रीय गीत, श्रृंगार गीत, प्रगतिवादी गीत, नवगीत, अगीत ,प्रचार गीत, लोक शैली के गीत एवं ग़ज़ल गीत, गीतिका आदि  में अपनी छटा विखेरता हुआ मिलता है | कुछ गीतों के उदाहरण देखें –----
मान भरे मौसम के, चेहरे उतरे फूलों के |
फैला जहर हवाओं में, दिन फिरे बबूलों के |
सच ने खाई मात, हौसले बढे गुनाहों के
हम प्यादे होगये बिना मंजिल की राहों के | ...गीत-सोम ठाकुर ( दैनिक जाग.)

टूटरहामनकाविश्वास
संकोचीहैंसारी/मनकीरेखाएं
रोकरहींमुझको,/ गहरीबाधाएं
अन्धकारऔरबढ़रहा,
उलटरहासाराआकाश ||”      --- डारंगनाथमिश्रसत्य(अगीत )

लोलुप भ्रमरों की बातें क्या ,
ललचाते अतुलित शूरवीर
इस तन की कृपा प्रणय भिक्षा
हित कितने ही पद दलित हुए |
पर आज मुझे क्यों लगता है ,
संगीत फूटता कण कण से || -- (लयबद्ध षट्पदी अगीत—डा श्याम गुप्त ) 

जब से गीत / छुए हैं तुमने
अधरों पर भीगी थिरकन है
जब से लय / भर दी है तुमने 
साँसों में भीनी सिहरन है |    --नवगीत –निर्मल शुक्ल
नारी, तुम सदा ठगी जाती!
कैशोर्य उमंग और तरंगें
एक ज्वाला पर सहस्र पतंगे।
तन के उभार और गहराई
नर दृष्टि उधर दौडी आई।।
        लक्ष अहेरियों में फँस जाती।
        नारी तुम ! सदा ठगी जाती।।---
सुधा शर्मा का गीत (रचनाकार से )
   किसने किया श्रृंगार प्रकृति का,
          अरे, कोई तो बतलाओ !
       डाल-डाल पर फूल खिले हैं
       ठण्डी  सिहरन  देती  वात
       पात गा रहे गीत व कविता
       कितने सुहाने दिन और रात
           मादकता मौसम में  कैसी ,अरे कोइ तो समझाओ |   
----विश्वम्भर व्यग्र



              अनेक अवरोधों के बाद भी गीत आज तक अपनी चमक दिखा रहा है| गीत अपने आप को सुनाने के लिए भी होता है यह विस्तारवादी नहीं होता| गीत का श्रृंगार है-शालीनता और संक्षिप्तता | लय आधारित होना अथवा संगीतमय लोकगीतों का ध्रुव पद पर आधारित होना गीत की विशेषता है जो इसे गीत बनाती है| गीत जो मृत्युंजय है, कालजयी है |

"अमन 'चाँदपुरी'का संस्मरण" (प्रस्तोता-डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

$
0
0
मित्रों आज मुझे अमन 'चाँदपुरी'का भेजा संस्मरण प्राप्त हुआ।
जिनका संक्षिप्त विवरण निम्नवत् है-
नाम- अमन सिहं 
जन्मतिथि- 25 नवम्बर 1997 ई. 
पता- ग्राम व पोस्ट- चाँदपुर 
तहसील- टांडा 
जिला- अम्बेडकर नगर 
(उ.प्र.)-224230
संपर्क : 09721869421
ई-मेल : kaviamanchandpuri@gmail.com
     यह संस्मरण है इक्कीसवीँ सदी के दूसरे दशक के दूसरे साल यानी सितम्बर 2012 का। उसी साल हाईस्कूल की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद मैनेँ ग्यारहवीँ मेँ दाखिला लिया था। उसी दौरान मुझ पर एक अजीब सा नशा चढ़ा था। मैँ अपने जनपद की कुछ प्रसिद्द, महान हस्तियोँ के बारे मेँ जानने के लिए और उन पर लिखने के लिए अखबारोँ की कटिँग आदि माध्यमोँ से जानकारी जुटाने लगा था। डॉ. लोहिया, मेँहदी हसन, सैय्यद अहमद, जयराम वर्मा और ध्रुव जायसवाल आदि लोग इस कड़ी मेँ मेरी रुचि को और भी प्रखर करते गये। 
    मैं जिनके बारे मेँ जानना चाहता था। जल्द ही दो-चार दिनोँ मेँ भरपूर जानकारी सम्बन्धित व्यक्ति के बारे मेँ जुटा लेता था।मुझे इस विषय मेँ रुचि तब आयी; जब मैनेँ श्रीकृष्ण तिवारी, जो कि उसी क्षेत्र के हैँ। जहाँ से मैँ हूँ. की पुस्तक "जिला अम्बेडकर नगर का आईना"पढ़ी। जिसमेँ वर्तमान समय और पूर्व की कुछ प्रमुख हस्तियोँ का संक्षिप्त परिचय है; केवल एक महापुरुष को छोडकर जिसपर उन्होंने विस्तृत पुस्तक, उनकी जीवनी लिखी है जिसका नाम है "पूर्वाँचल के गांधी जयराम वर्मा"यानी स्वर्गीय जयराम वर्मा जी। 
    मैनेँ इनके बारे मेँ काफी कुछ सुना था। ये उत्तर प्रदेश के आधे से ज्यादा भाग के गांधी कहलाते हैं। जो ईमानदारी, सादगी की मिशाल थे। प्रदेश सरकार मेँ मन्त्री भी रहे। राज्यपाल तक का पद जनता की सेवा मेँ समर्पित रहने के लिए ठुकरा दिया। 
    यह पुस्तक मुझे बहुतोँ प्रयास के बाद भी हासिल न हुई। इसका एक मात्र संस्करण 1999 मेँ छपा था जिसकी बमुश्किल 150 प्रतियाँ ही छपी थी। जिसे लेखक और प्रकाशक ने चुनिन्दा लोगोँ को ही नि:शुल्क वितरण किया था। यह पुस्तक बजार मेँ भी उपलब्ध नहीँ थी। इसे पाने का एक मात्र जरिया लेखक ही थे।
     सितम्बर से लेकर नवम्बर के मध्य मैँ हर दस-पन्द्रह दिनोँ मेँ एक बार जरुरश्रीकृष्ण तिवारी जी के घर जाता रहा। लेकिन उनके अस्वस्थ होने और लखनऊ मेँ होने कि वजह से मुझे हर बार निराश होकर लौटना पडता था।एक बार उनके सबसे छोटे सुपुत्र ने बताया जिनका नाम इस वक्त याद नहीँ आ रहा है कि यह पुस्तक मुझे एक और जगह (व्यक्ति) से प्राप्त हो सकती है और वो हैं श्रीराम अशीष वर्मा जी। 
    जो जयराम वर्मा जी द्वारा ही स्थापित "जयराम वर्मा बापू स्मारक इंटर कालेज"के प्रधानाचार्य और "पूर्वाँचल के गांधी जयराम वर्मा"के प्रकाशक भी है।मैँ इनके पास भी गया। और उस पुस्तक को पढ़ने के लिए अपनी उत्सुकता का जिक्र भी किया। लेकिन परिणाम वही रहा ढाक के तीन पात निराश लौटना पडा। इन्होनेँ साफ इनकार कर दिया और कहा "मेरे पास उपलब्ध नहीँ है।"जबकि उनके पास उस पुस्तक की दस-बारह से भी ज्यादा प्रतियाँ थी। फिर भी नहीँ है कहा। 
    खैर कोई बात नहीँ, मैं भी निराश होकर उसे पढने की मंशा छोड चुका था। मगर मैंने अपने अन्दर जब थोडी-सी काव्य प्रतिभा विकसित कर ली तो यह पुस्तक मुझे खुद ही ढूढती हुई चली आयी। 
     चार फरवरी को जयराम वर्मा जी की जयन्ती होती है। उस वर्ष उनकी 110 वीँ जयंती थी। इल्तिफातगंज मेँ जहां मैँ रहता था वहां घर के एकदम बगल मेँ ही जयराम वर्मा बापू स्मारक इंटर कालेज के इतिहास के लेक्चररश्री राकेश वर्मा जी रहते थे। जिन्हेँ मैँ अपनी रचित काव्य पक्तियाँ कभी-कभी सुनाता था। इन्होनेँ जयराम वर्मा जी पर उनके जन्मदिन के शुभ अवसर पर मुझसे एक कविता रचने का प्रस्ताव रखा। जिसे मैनेँ भी स्वीकार कर लिया। मगर समस्या यह थी कि मुझे जयराम वर्मा जी के बारे मेँ मालूम तो था; पर उतना पर्याप्त नहीँ था, काव्य रचना के लिए। 
      इन्होनेँ मुझे बताया कि उनके कालेज के लाइब्रेरी मेँ जयराम वर्मा जी की जीवनी है। उन्होनेँ कहा "मैँ अपने कालेज से पुस्तक ले आऊगां, तुम उसको पढ़कर जयराम वर्मा जी पर कविता लिख देना।"मैनेँ भी स्वीकृति दे दी। और जयराम वर्मा जी पर कविता भी रची। और वह पुस्तक जिसे पढ़ने के लिए मैँ महीनोँ ढूढता रहा, वह आखिरकार मुझे ही ढूढते हुऐ मेरे पास आ गयी। -चाँदपुरी

लघुकथा "जुनून"अमन 'चाँदपुरी' (प्रस्तोता-डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

$
0
0
मित्रों आज मुझे अमन 'चाँदपुरी'द्वारा भेजी गयी 
एक लघुकथा प्राप्त हुई।
अमन 'चाँदपुरी'एक नवोदित हस्ताक्षर हैं।
जिनका परिचय निम्नवत् है-
नाम- अमन सिहं 
जन्मतिथि- 25 नवम्बर 1997 ई. 
पता- ग्राम व पोस्ट- चाँदपुर 
तहसील- टांडा 
जिला- अम्बेडकर नगर 
(उ.प्र.)-224230
संपर्क : 09721869421
ई-मेल : kaviamanchandpuri@gmail.com
'जुनून' (लघु कहानी)
     मात्र पन्द्रह वर्ष की आयु में एक पैर खो देने के बाद रमेश को खाट (चारपाई) पर पड़े-पड़े घुटन सी महसूस होती थी। भागम-भाग की इस दुनिया में एक खाट तक ही उसका जीवन सीमित हो गया था। अन्य भाई-बहनों को चलता देख रमेश खुद को बेबस और लाचार समझने लगा था।
    एक दिन समाचार पत्र पढते समय खेल पृष्ठ के एक लेख पर रमेश की नज़र पड़ी। शीर्षक था - 'जल्दी चढ़ी पहाड़'
     रमेश ने इसे विस्तार से पढ़ा। इसमें इन्दू नामक एक पर्वतारोही महिला पर लेख था, जिसने एवरेस्ट पर सबसे कम समय मात्र आठ घण्टे चालिस मिनट में ही विजय प्राप्त कर इतिहास रचा था। रमेश ने इसी से सीख लेकर एवरेस्ट पर चढ़ाई करने की ठानी।
      रमेश ने अपने पिता जी से इस विषय में बात की और कुछ दिनों के प्रशिक्षण के बाद ही कृत्रिम पैरों की सहायता से सफलता पूर्वक एवरेस्ट पर चढ़ाई की। समय थोड़ा ज्यादा लगा, लगभग तेईस घंटे जो कि एक लंगड़े व्यक्ति के लिहाज से काफी ठीक और बेहतर था।
     मगर एवरेस्ट की चोटी से नीचे उतरते समय दुर्घटनावश गिर जाने के कारण रमेश की मौत हो गई। लेकिन उसने अपने जीवितता, हौसले और जुनून के दम पर जो काम कर दिखलाया वह आने वाली पढ़ी के लिए मिशाल बन गई।
     शायद रमेश को एवरेस्ट चढ़ने का मौका ही न मिला होता, मगर पिता जी के समक्ष उसने (रमेश) जो तर्क प्रस्तुत किया, उससे वह (पिता जी) निरुत्तर हो गये।
      रमेश का कहना था - 'मैं इस चार पाँव के खाट पर पड़े-पड़े अपना जीवन नहीं बिता सकता, एक न एक दिन तो मुझे मरना ही है। लेकिन इस खाट पर पड़े-पड़े तो मैं रोज मर रहा हूँ, मुझे चन्द दिन तो अच्छे से जी लेने दो। इंदू ने एवरेस्ट की चढ़ाई कुछ ही घन्टों में पूरी कर ली, मगर मैं अपाहिज अगर एवरेस्ट पर एक या दो दिन में भी चढ़ सका तो अपना जीवन धन्य समझुगाँ, अगर न चढ़ सका और गिरकर मर गया तो भी खुद को खुशनसीब समझुगाँ कि मैनें अपने जीवन में कुछ करने की ठानी तो थी, क्या हुआ जो सफलता नहीं मिली।'
लेकिन पाठकों रमेश को सफलता मिली।
-- अमन चाँदपुरी
नोट- दोस्तों ये मत सोचिएगा कि ये कहानी मैनें अपने जनपद की प्रसिद्ध पूर्व बालीबाल खिलाड़ी एवं पर्वतारोही एवरेस्ट विजेता अरुणिमा सिंहापर लिखी है। इसे मैनें नवम्बर 2012 में लिखा था। और अगले ही साल लखनऊ से निकलने वाली त्रैमासिक पत्रिका 'गाँव दुआर'के मार्च अंक में पृष्ठ नम्बर सात पर यह प्रकाशित हुई थी। जब कि अरुणिमा जी ने उसी साल इक्कीस मई को एवरेस्ट पर चढ़ने में सफलता पायी थी। आप ये नहीं कह सकते कि इस कहनी की प्रेरणा अरुणिमा जी हैं। लेकिन हाँ इस कहानी को अरुणिमा जी ने वास्तविकता में परिवर्तित कर दिया। ये मेरा सौभाग्य है।

कलुषित वृक्ष

$
0
0


कलुषित वृक्ष

नाम:- श्रीअनमोल तिवारी"कान्हा"
पिता:-श्री भँवर लाल जी तिवारी
माता:-श्रीमती नर्बदा देवी
पता:-पुराना राशमी रोड पायक 
        मोहल्ला वार्ड न•17 कपासन
तहसील:-कपासन
जिला:-चित्तौड़गढ़
राज्य:-राजस्थान
पिन कोड:-312202
सम्पर्क सूत्र:-9694231040 &
                   8955095189
साहित्य विधा:-गीत ,गजल,कविता,
प्रकाशन:-शब्द प्रवाह , वंदेमातरम 
             एवं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में
सम्मान:-शारदा साहित्य सम्मान,
             अनहद विशिष्ट काव्य सम्मान
           
          ****रचना*****
     (1) कलुषित वृक्ष

आज भी उठ रहा हैं 
काला धुआँ
सरहद के उस पार से
जिसकी विषैली बू
समा रही हैं सीनों में।
और करती है हरा
उस जख्म को
जो वर्षों पहले मिला था
बँटवारे के दिनों में।।
बटँवारा  जिसने 
  बहुत कुछ खोया।
और गुमशुदा घाटियों में
कलुषित बीज बोया।।
आज वो बीज
बन चुका हैं वृक्ष विशाल
जिसकी हरेक शाखाओं पर
है आतंक के काँटे।
और हो रहे हैं विकसित
बारूदी गंध युक्त पुष्प।।
   जिसकी हर टहनी पर
लटके हैं कई जहरीले साँप।
जो आतुर हैं निगलने को
मानवीय सँवेदनाएँ 
और करते है जहरीली फुकाँर।।
अजीब है खासियत 
  इस रक्त बीजी वृक्ष की
इसे चाहो जितना काटो
फिर पनप जाता हैं।
और करता है एक 
   कलुषित अट्ठाहस।।
और उजागर कर देता हैं
मानवीय दुर्बलता को।।
मगर होता है ,अंत हरेक का
यहीं है सृष्टि का नियम।
बस रण चंडी बन
   करे सार्थक प्रयत्न हम।।

अपूर्ण योग दिवस

$
0
0
२१ जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाया गया |यह एक अच्छी शुरुयात है |इसके लिए आयोजक एवं इसमे भाग लेनेवाले सभी प्रतिभागी बधाई के पात्र हैं | 'योग'का अर्थ होता है 'जोड़ना"'या "मिलाना"  अर्थात एक से अधिक वस्तुओं को एक दुसरे से संयुक्त करना ,उसमें एकरूपता लाना | ऋषि,मुनि , योगियों के लिए योग का अर्थ है- तन,मन को शांत कर आत्मा के साथ संरेखन कर परमात्मा तक पहुँचने के लिए प्रयत्न करना | अस्वस्थ शरीर में मन स्वस्थ नहीं हो सकता और अगर मन अस्वस्थ है तो ईश्वर के ध्यान में मन नहीं लगेगा | इसीलिए सबसे पहले शरीर को स्वस्थ व निरोगी बनाना अत्यन्त आवश्यक है | शरीर स्वस्थ होगा तो मन स्वस्थ होगा, तब परमात्मा के ध्यान में एकाग्रता आयगी | अत: योग का उद्येश्य है - तन,मन और आत्मा में अनुरूपता स्थापित करना |
             महर्षि पतंजलि के अनुसार योग का अर्थ "योगस्यचित्त वृत्तिनिरोध:"अर्थात योग मन के वृत्ति को रोकता है ,मन के भटकन पर नियंत्रण करता है |उन्होंने योग को आठ भागों में बांटा है जिसको अष्टांग योग कहते हैं | वे इस प्रकार हैं :- १.यम  २. नियम ३. आसन  ४. प्राणायाम  ५. प्रत्याहार  ६. धारणा ७.समाधि और ८. ध्यान |
            योग दिवस पर आयोजकों ने योग के केवल आसन और प्राणायाम पर ध्यान केन्द्रित किया है | इसके पहले यम और नियम आते हैं परन्तु इन पर ध्यान देना उचित नहीं समझा क्योंकि यम के अन्तर्गत "सत्य व अहिंसा का पालन , चोरी न करना ,आवश्यकता से अधिक चीजों का इकठ्ठा न करना "शामिल है | आज जग जाहिर है कि नेता न सत्य के मार्ग पर चलते हैं न अहिंसा का पालन करते हैं | इसके विपरीत वे दो समुदायों में हिंसा फैलाकर अपने वोटबैंक को पक्का करते हैं | मंत्री बड़े बड़े घपला कर सरकारी धन का गबन करते हैं ,दुसरे शब्दों में कहे तो चोरी करते हैं | बेनामी धंधों में माल इकठ्ठा करते हैं | ये सब योग के यम सिद्धांत के विपरीत हैं |इस दशा में यम का पालन कैसे कर सकते हैं ? अत; नेताओं ने यम पर न बोलना ही अपने हित में समझा और यम,नियम को छोड़कर सीधा आसन और प्राणायाम को योग के रूप में प्रस्तुत किया | योग के मूल सिद्धांत को छोड़कर केवल शारीरिक व्यायाम  को ही  योग का नाम दे दिया | यदि सही मायने में योग को अपनाना चाहते है तो योग के सभी आठ अंगों का पूरा पूरा पालन करना चाहिए | भ्रष्टाचार में डूबे देश के लिए यह उचित होगा कि मंत्री ,नेता ,सकारी व अ-सरकारी कर्मचारी पहले यम का पालन करने का शपथ लें और  तदनुरूप व्यावहार करे तभी योग दिवस मनाना सफल माना जायगा अन्यथा यह एक और दिखावा बनकर रह जायगा |

कालीपद "प्रसाद"

"क्षणिकाकार अमन चाँदपुरी" (समीक्षक-डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

$
0
0
"क्षणिकाकार अमन चाँदपुरी" 
     क्षणिका के क्रम में आज एक नवोदित आशुकवि अमन चाँदपुरी का परिचय पाठको से करा रहा हूँ। जिन्होंने ढेर सारी क्षणिकाओं को रचा है। उनकी क्षणिकाओं में मुझे मर्मस्पर्शी भाव देखने को मिला है।
      मेरे विचार से “क्षण की अनुभूति को चुटीले शब्दों में पिरोकर परोसना ही क्षणिका होती है। अर्थात मन में उपजे गहन विचार को थोड़े से शब्दों में इस प्रकार बाँधना कि कलम से निकले हुए शब्द सीधे पाठक के हृदय में उतर जाये।”
देखिए इनकी यह क्षणिका-
'दरार'
जब दरार पडती है रिश्तों में
वो आसानी से नहीं भरती
दीवार की दरारप्लास्टर भर सकता हैं
मगर रिश्तों में पड़ी दरार
बहुत मुश्किल से भरती हैं
जब कभी भरती हैं
तब भी
अपना निशान छोड़ जाती हैं।
     इनकी एक अत्यन्त मार्मिक क्षणिका भी है। जिसमें जीवन का दर्शन निहित है-
'मौत'
सिर्फ दो अक्षरऔर एक मात्रा
जिससे बचाया
मैंनेजीवन भर
क्या था वो शब्द
मौत
      अन्धविश्वास के खिलाफ भी इनका स्वर मुखरित हुआ है-
'बासी लकीरें'
मेरी बचकानी उम्र में ही
हाथ की जिन लकीरों को पढ़कर
 पंडित बाबा ने
मेरी भयानक कुंडली बनाई थी
बड़े होते ही
मैनेंउन सभी
बासी पड़ी लकीरों कोउतार फेंका
खुद नई-नई
और ताजा लकीरें बनाने के लिए
      बालश्रमिक के विरुद्ध अपनी अभिव्यक्ति को इन्होंने एक अलग ही अन्दाज़ में अपनी इस क्षणिका में व्यक्त किया है- 
'बालमजदूर'
स्टील का बर्तन
सीसे-सा चमकने लगा
एक परिवार के पालनहार ने
उसमें देखा –
अपना मासूम-सा चेहरा
उसे ठगा महसूस हुआ
सोचा –
 मैं समय से बहुत पहले बड़ा हो गया
      मुहावरे को क्षणिका में पिरोना बहुत कम लोग ही जानते हैं मगर इन्होंने मुहावरे का प्रयोग अपनी क्षणिका में सफलता के साथ किया है-
'समय'
समय के पाँवभारी हैं
उसे तेज चलनान सिखाओ
करेला नीम चढ़ जायेगा
     लोग सपिकाएँ लिखते हैं मगर इन्होंने अपनी सीपिका को क्षणिका के रूप में इस प्रकार पिरोया है।
 'बुजुर्ग'
बुजुर्ग की आँखें
अनुभव का सागर
     जैसा कि मैंने पहले ही उल्लेख किया है “आशुकवि ही सफल क्षणिकाकार हो सकता है। इनकी क्षणिकासृजन क्षमता इनकी निम्न क्षणिका का जीता जागता
उदाहरण है-
'आशुकवि'
कुछ समय के लिए
समय के पैरों में
बेड़ियाँ डाल दो
मैं आशुकवि बनना चाहता हूँ
जो तत्काल कविता ही नहीं
सम्पूर्ण ग्रंथ रचने में सक्षम हो
    मुझे आशा ही नहीं अपितु विश्वास भी है कि ये भविष्य में एक सफल साहित्यकार सिद्ध होंगे। मैं इनके उज्जवल भविष्य की कामना करता हूँ।
शुभकामनाओं के साथ!
समीक्षक
 (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
कवि एवं साहित्यकार 
टनकपुर-रोडखटीमा
जिला-ऊधमसिंहनगर (उत्तराखण्ड) 262 308
E-Mail .  roopchandrashastri@gmail.com
फोन-(05943) 250129 मोबाइल-09997996437
अमन चाँदपुरी का परिचय निम्नवत् है-
वास्तविक नाम- अमन सिंह
जन्मतिथि- 25 नवम्बर 1997
जन्म स्थान- ग्राम व पोस्ट - चाँदपुर, टांडा, अम्बेडकर नगर
शिक्षा- बी. ए.
पिता - श्री सुनील कुमार सिंह
लेखन- 15 मई 2012 से
विधाएं- कविता, क्षणिका, हाइकु
सम्पर्क- ग्राम व पोस्ट -चाँदपुर, टांडा, अम्बेड़कर नगर, यू.पी.
मोबाईल - +919721869421
मेल- kaviamanchandpuri@gmail.com

समलैंगिक विवाह ------आखिर हम जाना कहाँ चाहते हैं ?? ..ड़ा श्याम गुप्त....

$
0
0


                   आखिर हम जाना कहाँ चाहते हैं |
       अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट द्वारा समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता दी |    
       क्या बनाकर रख दिया है आज विवाह संस्थाको ! एक मज़ाक, एक नाटक | वस्तुतः इसी को भारतीय शास्त्रों में असुरत्व, अनार्यत्व कहा गया है | तो यह तो होना ही था |
      आखिर दाम्पत्य का क्या अर्थ है ?विवाह का अर्थ क्या है ?विशद रूप में दाम्पत्य-भाव का अर्थ है, दो विभिन्न भाव के तत्वों द्वारा  अपनी अपनी अपूर्णता सहित आपस में मिलकर पूर्णता व एकात्मकता प्राप्त करके विकास की ओर कदम बढाना। यह सृष्टि का विकास-भाव है । प्रथम सृष्टि का आविर्भाव ही प्रथम दाम्पत्य-भाव होने पर हुआ ।
    शक्ति-उपनिषदका श्लोक है  स वै नैव रेमे तस्मादेकाकी न रमते स द्वितीयमैच्छत। सहैता वाना स। यथा स्त्रीन्पुन्मासो संपरिस्वक्तौ स। इयमेवात्मानं द्वेधा पातपत्तनः पतिश्च पत्नी चा भवताम।  ---अर्थात अकेला ब्रह्म रमण न कर सका, उसने अपने संयुक्त भाव-रूप को विभाज़ित किया और दोनों पति-पत्नी भाव को प्राप्त हुए।
      यही प्रथम दम्पत्ति स्वयम्भू आदि-शिव व अनादि माया या शक्ति रूप है जिनसे समस्त सृष्टि का आविर्भाव हुआ। मानवी भाव में प्रथम दम्पत्ति मनु व शतरूपाहुए जो ब्रह्मा द्वारा स्वयम को स्त्री-पुरुष रूप में विभाज़ित करके उत्पन्न किये गयेजिनसे समस्त सृष्टि की उत्पत्ति हुई। सृष्टि का प्रत्येक कण धनात्मक या ऋणात्मक  ऊर्ज़ा वाला है, दोनों मिलकर पूर्ण होने पर ही, तत्व एवम यौगिक व पदार्थ की उत्पत्ति तथा विकास होता है।

      मानव समाज के विकास के एक स्थल पर,जब संतान की आवश्यकता के साथ उसकी सुरक्षा की आवश्यकता हुई एवं यौन मर्यादा न होने से आचरणों के बुरे व विपरीत व्यक्तिगत व सामाजिक परिणाम हुए तो श्वेतकेतु ने सर्वप्रथम विवाह संस्था रूपी मर्यादास्थापित की ताकि प्राकृतिक काम संवेग की व्यक्तिगत संतुष्टि के साथ साथ स्त्री-पुरुष के आपसी सौहार्दिक सम्बन्ध एवं सामाजिक समन्वयता भी बने रहे |   यजु.१०/४५में कथन है
   एतावानेन पुरुषो यजात्मा प्रतीति। 
   विप्राः प्राहुस्तथा चैतद्यो भर्ता सांस्म्रतांगना ॥“ 
      अर्थातपुरुष भी स्वयं अकेला पुरुष नहीं बनता अपितु पत्नी व संतान मिलकर ही पूर्ण





पुरुष बनता है। स्त्री के लिए भी यही सत्य है | अतः दाम्पत्य-भाव ही पुरुष को भी संपूर्ण करता है, स्त्री को भी ।
       ऋषि कहता हैपुत्रिणा तद कुमारिणाविश्वमाव्यर्श्नुतः। उभा हिरण्यपेशक्षा॥. ऋग्वेद ८/३१/६६७९इस प्रकार वे दोनों( सफ़ल दम्पति ) स्वर्णाभूषणों व गुणों ( धन पुत्रादि बैभव) से युक्त  होकर र्संतानों के साथ पूर्ण एश्वर्य व आयुष्य को प्राप्त करते हैं।  एवम८/३१/६६७९"वीतिहोत्रा क्रत्द्वया यशस्यान्ताम्रतण्यकम”—देवों की उपासना करके अन्त में अमृतत्व प्राप्त करते हैं।
     इस प्रकार सफ़ल दाम्पत्य का प्रभाव व उपलब्धियां ही हैं जो मानव को जीवन के लक्ष्य तक ले जाती है।
       यदि स्त्री-स्त्री या पुरुष-पुरुष विवाह किसी भी दृष्टिकोण से उचित होता तो आखिर क्यों दाम्पत्य भाव या स्त्री-पुरुष विवाह की आवश्यकता होती एवं यह प्रथा अस्तित्व में आती | जिसे जैसी मर्जी को रहे, क्या अंतर पड़ता है, व्यक्ति को, समाज को, सभ्यता को, मानवता को, विकास को | हाँ विकास के लिए धनात्मक व ऋणात्मक समवाय की आवश्यकता होती है , चाहे वह प्राणी-जगत का विकास हो या जड़ जगत का |
      तो स्त्री-स्त्री, पुरुष-पुरुष अर्थात समलैंगिक संबंधों में कोइ भी विकास की संभावना कहाँ है | क्या हम जड़ समाज की स्थापना करना चाहते हैं विकासहीन समाज की एक स्थिर सभ्यता-संस्कृति की –जहां ठहरा हुआ जल कीचढ़ एवं लिज़लिज़े कृमि-कीट ही उत्पन्न कर सकता है |
     आखिर हम जाना कहाँ चाहते हैं ?

मेरी नवीन कृति ...कुछ शायरी की बात होजाए --ड़ा श्याम गुप्त ...

$
0
0


मेरी नवीन कृति ...कुछ शायरी की बात होजाए --ड़ा श्याम गुप्त ...

                     

        मेरी नवीन कृति ...कुछ शायरी की बात होजाए ...ग़ज़ल, नज़्म, रुबाई, कतए व शेर का संग्रह ....







.                                                          बातशायरीकी
             कविता, काव्य या साहित्य किसी विशेष, कालखंड, भाषा, देश या संस्कृति से बंधित नहीं होते | मानव जब मात्र मानव था जहां जाति, देश, वर्ण, काल, भाषा, संस्कृति से कोई सम्बन्ध नहीं था तब भी प्रकृति के रोमांच, भय, आशा-निराशा, सुख-दुःख आदि का अकेले में अथवा अन्य से सम्प्रेषण- शब्दहीन इंगितों, अर्थहीन उच्चारण स्वरों में करता होगा | आदिदेव शिव के डमरू से निसृत ध्वनि से बोलियाँ, अक्षर, शब्द की उत्पत्ति के साथ ही श्रुति रूप में कविता का आविर्भाव हुआ| देव-संस्कृति में शिव व आदिशक्ति की अभाषित रूप में व्यक्त प्रणय-विरह की सर्वप्रथम कथा के उपरांत देव-मानव या मानव संस्कृति की, मानव इतिहास की सर्वप्रथम भाषित रूप में व्यक्त प्रणय-विरह गाथा ‘उर्वशी–पुरुरवा’ की है | कहते हैं कि सुमेरु क्षेत्र, जम्बू-द्वीप, इलावर्त-खंड स्थित इन्द्रलोक या आज के उजबेकिस्तान की अप्सरा ( बसरे की हूर) उर्वशी, भरतखंड के राजा पुरुरवा पर मोहित होकर उसकी पत्नी बनी जो अपने देश से उत्तम नस्ल की भेड़ें तथा गले के लटकाने का स्थाली पात्र, वर्फीले देशों की अंगीठी –कांगड़ी- जो गले में लटकाई जाती है, लेकर आयी। प्रणय-सुख भोगने के पश्चात उर्वशीगंधर्वों अफरीदियों के साथ अपने देश चली गईऔर पुरूरवाउसके विरह में छाती पीटता रोता रहा विश्व भर में उसे खोजता रहा। उसका विरह-रूदन गीत ऋग्वेदके मंत्रों में है, यहीं से संगीत, साहित्य और काव्य का प्रारम्भ हुआ। अर्वन देश (घोड़ों का देश) अरब तथा पुरुर्वन देश फारस के कवियों ने इसी की नकल में रूवाइयां लिखीं एवं तत्पश्चात ग़ज़ल आदि शायरी की विभिन्न विधाएं परवान चढी जिनमें प्रणय भावों के साथ-साथ मूलतः उत्कट विरह वेदना का निरूपण है । शायरी ईरान होती हुई भारत में उर्दू भाषा के माध्यम से आयी, प्रचलित हुई और सर्वग्राही भारतीय संस्कृति के स्वरूपानुसार हिन्दी ने इसे हिन्दुस्तानी-भारतीय बनाकर समाहित कर लिया| आज देवनागरी लिपि में उर्दू के साथ-साथ हिन्दुस्तानी, हिन्दी एवं अन्य सभी भारतीय क्षेत्रीय भाषाओं में भी शायरी की जा रही है |
        शायरी अरबी, फारसीउर्दूजुबानकीकाव्य-कलाहै | इसमेंगज़ल, नज़्म, रुबाई, कतेशेआदिविविधछंदकाव्य-विधाएंप्रयोगहोतीहैं, जिनमेंगज़लसर्वाधिकलोकप्रियहुई | गज़लनज़्ममेंयहीअंतरहैकिनज़्महिन्दीकविताकीभाँतिहोतीहै| नज़्मएककाव्य-विषयकथ्यपरआधारितकाव्य-रचनाहैजोकितनीभीलंबी, छोटीअगीतकीभांतिलघुहोसकतीहैएवंतुकांतयाअतुकांतभी | गज़लमूलतःशेरों (अशारयाअशआर) कीमालिकाहोतीहैऔरप्रायःइसकाप्रत्येकशेविषयभावमेंस्वतंत्रहोताहै |
            नज़्म विषयानुसारतीनतरहकीहोतीहैं ---मसनवीअर्थातप्रेमअध्यात्म, दर्शनअन्यजीवनकेविषय, मर्सिया ..जिसमेंदुःख, शोक, गमकावर्णनहोताहैऔरकसीदायानीप्रशंसाजिसमेंव्यक्तिविशेषकाबढ़ा-चढाकरवर्णनकियाजाताहै | एकलघुअतुकांतनज्मपेशहै...
             सच,
               यहतुलसीकैसीशांतहै
               औरकश्मीरकीझीलें
              किस-किसतरह
              उथल-पुथलहोजातीहैं
             औरअल्लाह
             मैं !               ...........मीनाकुमारी...       

                रुबाई मूलतःअरबीफारसीकास्वतंत्र ..मुक्तकहैजोचारपंक्तियोंकाहोताहैपरवोदोशेरनहींहोतेइनमेंएकहीविषयभावहोताहैऔरकथ्यचौथेमिसरेमेंहीमुकम्मिलस्पष्टहोताहै | तीसरेमिसरेकेअलावाबाकीतीनोंमिसरोंमेंकाफियारदीफएकहीतुकांतमेंहोतेहैंतीसरामिसराइसबंदिशसेआज़ादहोताहै | परन्तुरुबाईमेंपहलातीसरादूसराचौथामिसरेकेतुकांतभीसमहोसकतेहैंऔरचारोंकेभी | फारसीशायर ...उमरखय्यामकीरुबाइयांविश्व-प्रसिद्दहैं |..उदाहरण- एकरुबाई...--.              
                                                        इकनईनज़्मकहरहाहूँमैं
                               अपनेज़ज्वातकीहसींतहरीर |
                               किसमौहब्बतसेतकरहीहैमुझे,
                                दूररक्खीहुईतेरीतस्वीर || “       .... निसारअख्तर
                     कतआ भीहिन्दीकेमुक्तककीभांतिचारमिसरोंकाहोताहै,  यहदोशेरोंसेमिलकरबनताहै | इसमेंएकमुकम्मिलशेहोताहै..मतलातथाएकअन्यशेहोताहै| जबशायर ..एकशेरमेंअपनापूराख्यालज़ाहिरकरपाएतोवोउसख्यालकोदुसरेशेरसेमुकम्मलकरताहैकतआशायदउर्दूमेंअरबी-फारसीरुबाईकाविकसितरूपहै| अर्थातदोशेरोंकीगज़ल| एकउदाहरणपेशहै....--  
       दर्देदिलकोजोजीपाये |
         जख्मे-दिलकोजोसीपाए |
       दर्दे-ज़मांहीख्वाव हैजिसका  
खुदा  भीउसदिलमेंहीसमाये ||”     ...डाश्यामगुप्त                                                                                                                                           

                   शेदोपंक्तियोंकीशायरीकेनियमोंमेंबंधीहुईवहरचनाहैजिसमेंपूराभावयाविचारव्यक्तकरदियागयाहो | 'शेर'काशाब्दिकअर्थहै --'जानना'अथवाकिसीतथ्यसेअवगतहोनाऔरशायरकाअर्थजाननेवाला ...अर्थातकविर्मनीषीस्वयंभूपरिभू ...क्रान्तिदर्शी ...कवि |  इनदोपंक्तियोंमेंशायरयाकविअपनेपूरेभावव्यक्तकरदेताहैयेअपनेआपमेंपूर्णहोनेचाहिएउनपंक्तियोंकेभाव-अर्थसमझानेकेलिएकिन्हींअन्यपंक्तिकीआवश्यकतानहींहोनीचाहिए | गज़लशेरोंकीमालिकाहीहोतीहै|अपनीसुन्दरतुकांतलय, गतिप्रवाहतथाप्रत्येकशेस्वतंत्रमुक्तविषय-भावहोनेकेकारणकेकारणसाथहीसाथप्रेम, दर्द, साकी-मीनाकथ्योंवर्ण्यविषयोंकेकारणगज़लविश्वभरकेकाव्यमेंप्रसिद्दहुईजन-जनमेंलोकप्रियहुई | ऐसास्वतंत्रशेजोतन्हाहोयानीकिसीनज़्मयाग़ज़लयाकसीदेयामसनवीकापार्टहो ..उसेफर्दकहतेहैं |
             गज़लदर्दे-दिलकीबातबयाँकरनेकासबसेमाकूलखुशनुमांअंदाज़है | इसकाशिल्पभीअनूठाहै | नज़्मरुबाइयोंसेजुदा | इसीलियेविश्वभरमेंजन-सामान्यमेंप्रचलितहुई | हिन्दीकाव्य-कलामेंइसप्रकारकेशिल्पकीविधानहींमिलती | मैंकोईशायरीगज़लकाविशेषज्ञज्ञातानहींहूँ | परन्तुहमलोगहिन्दीफिल्मोंकेगीतसुनतेहुएबड़ेहुएहैंजिनमेंवाद्य-इंस्ट्रूमेंटेशनकी  सुविधाहेतुगज़लनज़्मकोभीगीतकीभांतिप्रस्तुतकियाजातारहाहै | उदाहरणार्थ - फिल्मेगीतकारसाहिरलुधियानवीकागीत/ग़ज़ल......
       संसारसेभागेफिरतेहोसंसारकोतुमक्यापाओगे।
       इसलोककोभीअपनासकेउसलोककोमेंभीपछताओगे।
       येपापहैक्यायेपुण्यहैक्यारीतोंपरधर्मकीमोहरेंहैं
       हरयुगमेंबदलतेधर्मोंकोकैसेआदर्शबनाओगे।---

                      गज़लकामूलछंदशेयाशेअरहै | शेरवास्तवमेंदोहाकाहीविकसितरूपहैजोसंक्षिप्ततामेंतीब्रसटीकभाव-सम्प्रेषणहेतुसर्वश्रेष्ठछंदहै | आजकलउसकेअतुकांतरूप-भावछंद ..अगीत, नव-अगीतत्रिपदा-अगीतभीप्रचलितहैं| अरबी, तुर्कीफारसीमेंभीइसेदोहाहीकहाजाताहैअंग्रेज़ीमेंकसीदामोनोराइम( quasida mono rhyme)|  अतःजोदोहामेंसिद्धहस्तहैअगीतलिखसकताहैवहशेभीलिखसकताहै..गज़लभी | शेरोंकीमालिकाहीगज़लहै |
          छंदोंगीतोंकेसाथ-साथदोहाअगीत-छंदलिखतेहुएगज़लसुनते, पढतेहुएमैंनेयहअनुभवकियाकिउर्दूशेभीसंक्षिप्ततासटीकभाव-सम्प्रेषणमेंदोहेअगीतकीभांतिहीहैऔरइसकाशिल्पदोहेकीभांति ...अतःलिखाजासकताहै, औरनज्मेंतोतुकांत-अतुकांतगीतकेभांतिहीहैं, औरगज़लोंनज्मोंकासिलसिलाचलनेलगा |
                  भारतमेंशायरीगज़लफारसीकेसाथसूफी-संतोंकेप्रभाववशप्रचलितहुई |   मेराउर्दूभाषाज्ञानउतनाहीहैजितनाकिसीआमउत्तर-भारतीयहिन्दीभाषीका | मुग़लसाम्राज्यकीराजधानीआगरा (.प्र.) मेराजन्मशिक्षास्थलरहाहैजहांकीसरकारीभाषाअभीकुछसमयतकभीउर्दूहीथी | अतःवहाँकीजन-भाषासाहित्यकीभाषाभीउर्दूहिन्दीबृजमिश्रितहिन्दीहै | इसी  क्षेत्रकेअमीरखुसरोनेसर्वप्रथमउर्दूहिन्दवीमेंमिश्रितगज़ल-नज्मेंआदिकहनाप्रारम्भकिया | अतःइसकृतिमेंअधिकाँशगज़लें, नज़्म, कतेआदिउर्दू-हिन्दीमिश्रितकहीं-कहींबृजभाषामिश्रितहैं | कहीं-कहींउर्दूगज़लेंहिन्दीगज़लेंभीहैं |
              मुझेगज़लआदिकेशिल्पकाभीप्रारंभिकज्ञानहीहै | जबमैंनेविभिन्नशायरोंकीशायरीगज़लेंनज्मेंआदि  सुनी-पढींदेखीं  विशेषतयागज़ल...जोविविधप्रकारकीथीं..बिनाकाफिया, बिनारदीफ, वज्नआदिकाउठनागिरनाआदि ...तोमुझेख्यालआयाबसलयगतिसेगातेचलिए, गुनगुनातेचलिएगज़लबनतीचलीजायगी |कुछफिसलतीगज़लेंहोंगीकुछभटकतीग़ज़ल|  हाँलयगतियतियुक्तगेयताभाव-सम्प्रेषणयुक्तता  तथासामाजिक-सरोकारयुक्तहोनाचाहिएऔरआपकेपासभाषा, भाव, विषय-ज्ञानकथ्य-शक्तिहोना  चाहिए|  यहबातगणबद्धछंदोंकेलिएभीसचहै | तोकुछशेआदिजेहनमेंयूंचलेआये.....
             मतलाबगैरहोगज़ल, होरदीफभीनहीं,
             यहतोगज़लनहीं, येकोइवाकयानहीं |
           लयगतिहोतालसुरसुगम, आनंदरसबहे,
             वहभीगज़लहै, चाहे  कोईकाफियानहीं | “  
           बसगाते-गुनगुनातेजोगज़ले-नज्मेंआदिबनतींगयीं... जिनमेंत्रिपदा-अगीतगज़ल, अति-लघुनज़्मआदिकुछनएप्रयोगभीकियेगएहै..  यहाँपेशहैं...मुलाहिजाफरमाइए ........
                                                                                               ------डाश्यामगुप्त     
 

"महाकवि तुलसीदास की जयन्ती पर विशेष’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

$
0
0

महाकवि तुलसीदास की जयन्ती पर विशेष
"सूर-सूर तुलसी शशि, उडुगन केशव दास।
अब के कवि खद्योत सम, जहँ-तहँ करत प्रकाश।।’’
ब्लागर मित्रों!
आज से 26 वर्ष पूर्व मेरा एक लेख
नैनीताल से प्रकाशित होने वाले
समाचारपत्र
"दैनिक उत्तर उजाला"
में प्रकाशित हुआ था।
इसे साफ-साफ पढ़ने के लिए-
कृपया समाचार की कटिंग पर
एक चटका लगा दें।
भगवान राम की गाथा को
रामचरित मानस के रूप में
जन-जन में प्रचारित करने वाले महाकवि तुलसीदास की स्मृति
उर में संजोए हुए यह लेख मूलरूप में आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ।

शरीर में आत्मा का निवास कहाँ होता है ...ड़ा श्याम गुप्त ..

$
0
0

                   



                  आत्मा का निवास कहाँ होता है
          ब्रह्मा से बालखिल्यमुनियों ने पूछा कि आत्मा कहां स्थित है तो वे बोले- यह आत्मा तेज, संकल्प, प्रज्ञान, अहंकार व प्रजापति आदि पांच रूपों में ह्रदय गुहा में स्थित  रहता है | सत्य संकल्पित मन, प्राण भी यही आत्मा है |
          वृहदारण्यक उपनिषद् में आत्मा को चावल या यव (जौ) के दाने के सामान सूक्ष्म , हृदय में स्थित बताया है |


     कठोपनिषद १/२० कहता है --- 
“अणो अणीयान, महतो महीयानात्मास्य जन्तोर्निहितो गुहायाम “ ------यह लघुतम से भी लघुतम व महान से भी महान आत्मा प्राणियों के गुहा ( ह्रदय ) में स्थित रहता है |
     कठोपनिषद १/१२ में कथन है – 
“ते ददर्श गूढ्मनुप्रविष्ठं, 
गुहाहितं गह्वरेष्ठं पुराणे |”
---.--अर्थात पुराणों के गूढ़ ज्ञान रूपी गहन गुहा में प्रविष्ट करके उसे ( आत्मा को ) देखा/ जाना जा सकता है|
     यहाँ ब्रह्म व आत्मा का एकत्व प्रतिपादित करते हुए कठोपनिषद का कथन है----
कठ. २/१३ में कहा है-- तस्मात्म स्थं ये अनुपश्यन्ति धीरा ...
-----धीर लोग उसे ( ब्रह्म को )आत्म में स्थित देखते हैं |
कठोपनिषद २/१७ में कथन है---
अंगुष्ठ मात्र पुरुषोsन्तरात्मा:, 
सदा जनानां हृदये संनिविष्ठ:....
------यह अंगुष्ठ आकार का पुरुष या आत्मा सदा मनुष्य के ह्रदय में स्थित रहता है |

अगीत महाकाव्य ---सृष्टि --बिगबेंग या ईषत - इच्छा -एक अनुत्तरित उत्तर.-सर्ग-१ .... डा श्याम गुप्त....

$
0
0

सृष्टि ..ईषत -इच्छा या बिग-बेंग;एक अनुत्तरित उत्तर-डा श्याम गुप्त... 

             सृष्टि -सृजन के आधुनिक वैज्ञानिक, वैदिक एवं दार्शनिक-आध्यात्मिक तथ्यों का समन्वित विवेचन द्वारा उत्तर की खोज विषयक यह महाकाव्य ११ सर्गों में विरचित है | इस महाकाव्य हेतु मैंने अगीत विधा का एक विशिष्ट नवीन छंद की सृष्टि की है जिसे मैंने  "लयबद्ध षटपदी अगीत छंद"  का नाम दिया है आज से हम इसे क्रमिक रूप में प्रस्तुत करेंगे |  प्रस्तुत है प्रथम सर्ग -वन्दना ...

 

 

 

    

 सृष्टि -ईषत-इच्छा या बिग-बेंग; एक अनुत्तरित उत्तर ( अगीत विधा महाकाव्य)


 


(यह महाकाव्य अगीत विधा में आधुनिक-विज्ञान ,दर्शन व वैदिक विज्ञान के समन्वयात्मक विषय पर सर्वप्रथम रचित महाकाव्य है, इसमें सृष्टि की उत्पत्ति, ब्रह्माण्ड व जीवन व मानव की उत्पत्ति के गूढ़तम विषय को सरल भाषा में व्याख्यायित किया गया है ....एवं अगीत विधा के लयबद्ध षटपदी छंद में निवद्ध किया गया है जो एकादश सर्गों में वर्णित है.... रचयिता )


सृष्टि -अगीत विधा महाकाव्य-

रचयिता----डा.श्याम गुप्त
प्रकाशक---अखिल भा.अगीत परिषद् ,लखनऊ.
               अगीत विधा में ब्रह्माण्ड की रचना एवं जीवन की उत्पत्ति  के वैदिक, दार्शनिक व आधुनिक वैज्ञानिक तथ्यों का विवेचनात्मक प्रबंध-काव्य
(छंद ----लय बद्ध,षटपदी अगीत छंद ---छह पंक्ति, १६ मात्रा प्रत्येक पंक्ति में, अतुकांत, लय-वद्ध )


प्रथम-सर्ग --वन्दना 
१-गणेश -
गण-नायक गज बदन विनायक ,
मोदक प्रिय,प्रिय ऋद्धि-सिद्धि के ;
भरें  लेखनी में गति, गणपति ,
गुण गाऊँ इस 'सृष्टि', सृष्टि के।
कृपा  'श्याम  पर करें उमासुत ,
करूं  वन्दना पुष्पार्पण कर।।

-सरस्वती --
वीणा के जिन ज्ञान स्वरों से,
माँ !  ब्रह्मा को हुआ स्मरण'' |
वही ज्ञान स्वर ,हे माँ वाणी !
ह्रदय तंत्र में झंकृत करदो |
सृष्टि ज्ञान स्वर मिले श्याम को,
करूं  वन्दना पुष्पार्पण कर॥

-शास्त्र -
हम  कौन, कहाँ से  आए हैं ?
यह जगत पसारा किसका,क्यों ?
है शाश्वत यक्ष-प्रश्न, मानव का।
देते  हैं, जो  वेद - उपनिषद् ,
समुचित उत्तर; श्याम'उन्ही की,
करूं  वन्दना पुष्पार्पण कर॥

४-ईश्वर-सत्ता --
स्थिति, सृष्टि व लय का जग के,
कारण-मूल जो  वह परात्पर;
सद-नासद में अटल-अवस्थित,
चिदाकास  में  बैठा - बैठा,
संकेतों से  करे  व्यवस्था,
करूं  वन्दना पुष्पार्पण कर ॥

५-ईषत-इच्छा--'२'
उस अनादि की ईषत-इच्छा
महाकाश के भाव अनाहत,
में, जब द्वंद्व-भाव भरती है ;
सृष्टि-भाव तब विकसित होता-
आदि कणों में,  उस इच्छा की,
करूँ  वन्दना पुष्पार्पण कर॥

६- अपरा -माया --
कार्यकारी  भाव-शक्ति है,
उस परात्पर ब्रह्म की जो;
कार्य-मूल कारण है जग की,
माया है उस निर्विकार की;
अपरा'३'दें वर,श्याम'सृष्टि को,
करूँ वन्दना पुष्पार्पण कर॥

७.चिदाकाश --
सुन्न-भवन'४'में अनहद बाजे ,
सकल जगत का साहिब बसता;
स्थिति,लय और सृष्टि साक्षी,
अंतर्मन में  सदा  उपस्थित,
चिदाकाश की, जो अनंत है;
करूँ वन्दना पुष्पार्पण कर॥

८-विष्णु --
हे ! उस अनादि के व्यक्त भाव,
हे! बीज-रूप हेमांड'५'अवस्थित;
जगपालक, धारक, महाविष्णु,
कमल-नाल  ब्रह्मा को धारे;
'श्याम-सृष्टि'को, श्रृष्टि धरा दें,
करूँ  वन्दना  पुष्पार्पण कर॥

९-शंभु-महेश्वर --
आदिशंभु - अपरा संयोग से,
महत-तत्व'६'जब हुआ उपस्थित,
व्यक्त रूप जो उस निसंग का।
लिंग रूप बन तुम्ही महेश्वर !
करते  मैथुनि-सृष्टि अनूप;
करूँ वन्दना पुष्पार्पण कर॥

१०-ब्रह्मा --
कमल नाल पर प्रकट हुए जब,
रचने   को  सारा ब्रह्माण्ड;
वाणी की स्फुरणा'७'पाकर,
बने रचयिता सब जग रचकर ।
दिशा-बोध मिल जाय 'श्याम,को;
करूँ  वन्दना  पुष्पार्पण कर॥

११-दुष्टजन -वन्दना--
लोभ-मोह वश बन खलनायक,
समय-समय पर निज करनी से;
जो  कर देते व्यथित धरा को ।
श्याम, धरा को मिलता प्रभु का,
कृपा भाव,  धरते अवतार;
करूँ वन्दना पुष्पार्पण कर॥                          ---क्रमश:

कुंजिका----
( =सृष्टि-ज्ञान का स्मरण ,=सृष्टि-सृजन की ईश्वरीय इच्छा,  = आदि-मूल शक्ति,  ४=शून्य,अनंत-अन्तरिक्ष, क्षीर सागर, मन ; =स्वर्ण अंड के रूप में ब्रह्माण्ड;  =मूल क्रियाशील व्यक्त तत्व ;  = सरस्वती की कृपा से ज्ञान का पुनः स्मरण )

----------------सृष्टि महाकाव्य   क्रमशः ---द्वितीय सर्ग  -- उपसर्ग ...अगली पोस्ट में 

सृष्टि-महाकाव्य --बिगबेंग या ईषत - इच्छा -एक अनुत्तरित उत्तर.-सर्ग-२.... डा श्याम गुप्त....

$
0
0

  महाकाव्य ---सृष्टि --बिगबेंग या ईषत - इच्छा -एक अनुत्तरित उत्तर.-सर्ग-२ ....उपसर्ग..

               सृष्टि -सृजन के आधुनिक वैज्ञानिक, वैदिक एवं दार्शनिक-आध्यात्मिक तथ्यों का समन्वित विवेचन द्वारा उत्तर की खोज विषयक यह महाकाव्य ११ सर्गों में विरचित है | इस महाकाव्य हेतु मैंने अगीत विधा का एक विशिष्ट नवीन छंद की सृष्टि की है जिसे मैंने  "लयबद्ध षटपदी अगीत छंद"  का नाम दिया है इसे हम इसे क्रमिक रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं  |  प्रस्तुत है द्वितीय  सर्ग - उपसर्ग ....

 

 

 


    

(यह महाकाव्य अगीत विधा में आधुनिक-विज्ञान ,दर्शन व वैदिक विज्ञान के समन्वयात्मक विषय पर सर्वप्रथम रचित महाकाव्य है, इसमें सृष्टि की उत्पत्ति, ब्रह्माण्ड व जीवन व मानव की उत्पत्ति के गूढ़तम विषय को सरल भाषा में व्याख्यायित किया गया है ....एवं अगीत विधा के लयबद्ध षटपदी छंद में निवद्ध किया गया है जो एकादश सर्गों में वर्णित है.... रचयिता )


सृष्टि -अगीत विधा महाकाव्य-

रचयिता----डा.श्याम गुप्त.....प्रकाशक---अखिल भा.अगीत परिषद् ,लखनऊ.
               अगीत विधा में ब्रह्माण्ड की रचना एवं जीवन की उत्पत्ति  के वैदिक, दार्शनिक व आधुनिक वैज्ञानिक तथ्यों का विवेचनात्मक प्रबंध-काव्य
(छंद ----लय बद्ध,षटपदी अगीत छंद ---छह पंक्ति, १६ मात्रा प्रत्येक पंक्ति में, अतुकांत, लय-वद्ध )


सृष्टि महाकाव्य--द्वितीय सर्ग...-उपसर्ग-(प्रस्तुतसर्गमेंआजकीस्वार्थपरकतासे उत्पन्नअभिचार, द्वंद्व,अशांतिक्योंहैमानवनेईश्वरकोक्योंभुला दियाहैएवंउसकेक्यापरिणामहोरहेहैंऔरसृष्टिजैसेदार्शनिकविषयकोकोईक्योंजाने-पढ़ेइसपरविवेचनकियागयाहै )
.
नर ने भुला दिया प्रभु नरसे,
ममताबंधननेहसमर्पण;
मानव का दुश्मन बन बैठा ,
अनियंत्रित वह अति-अभियंत्रण।
अति सुख अभिलाषा हित जिसको,
स्वयं उसी ने किया सृजन था।।
.
निजी स्वार्थ के कारण मानव,
अति दोहन कर रहा प्रकृति का;
प्रतिदिन एक ही स्वर्ण अंड से,
उसका लालच नहीं सिमटता;
चीर कलेजा, स्वर्ण खजाना,
पाना चाहे एक साथ ही।।
.
सर्वश्रेष्ठ है कौन?, व्यर्थ ,
इस द्वंद्व भाव में मानव उलझा;
भूल गया है मानव ख़ुद ही ,
सर्वश्रेष्ठ कृति है, ईश्वर की ।
सर्वश्रेष्ठ, क्यों कोई भी हो ,
श्रेष्ठ क्यों न हों,भला सभी जन।।
.
पहले सभी श्रेष्ठ बन जाएँ,
आपस के सब द्वंद्व मिटाकर;
द्वेष,ईर्ष्या, स्वार्थ भूलकर,
सबसे समता भाव निभाएं;
मन में भाव रमें जब उत्तम,
प्रेम भाव का हो विकास तब।।
.
जन संख्या के अभिवर्धन से,
अनियंत्रित यांत्रिकी करण से;
बोझिल बोझिल मानव जीवन।
भार धरा पर बढ़ता जाता,
समय-सुनामी की चेतावनि,
समझ न पाये,प्रलय सुनिश्चित।

.
जग की इस अशांति क्रंदन का,
लालच लोभ मोह बंधन का;
भ्रष्ट- पतित सत्ता गठबंधन,
यह सब क्यों? इस यक्ष प्रश्न(१) का,
एक यही उत्तर, सीधा सा,
भूल गया नर आज स्वयं को।।
.
क्यों मानव ने भुला दिया है,
वह ईश्वर का स्वयं अंश है;
मुझमें तुझमें शत्रु मित्र में;
ब्रह्म समाया कण-कण में वह|
और स्वयं भी वही ब्रह्म है,
फ़िर क्या अपना और पराया।।
.
सोच हुई है सीमित उसकी,
सोच पारहा सिर्फ़ स्वयं तक;
त्याग, प्रेम उपकार-भावना,
परदुख,परहित,उच्चभाव सब ;
हुए तिरोहित,सीमित है वह,
रोटी कपडा औ मकान तक।। 
.
कारण-कार्य,ब्रह्म औ माया(२)
सद-नासद(3) पर साया किसका?
दर्शन और संसार प्रकृति के ,
भाव नहीं अब उठते मन में;
अन्धकार- अज्ञान- में डूबा,
भूल गया मानव ईश्वर को।।
१०.
सभी समझलें यही तथ्य यदि,
हम एक बृक्ष के ही फल हैं;
वह एक आत्म-सत्ता, सबके,
उत्थान-पतन का कारण है;
जिसका भी बुरा करें चाहें,
वह लौट हमीं को मिलना है।।
११.
हम कौन?,कहाँ से आए है?
और कहाँ चले जाते हैं सब?
यह जगत-पसारा कैसे,क्यों?
और कौन? समेटे जाता है।
निज को,जग को यदि जानेंगे,
तब मानेंगे, समता भाव ।।
१२.
तब नर,नर से करे समन्वय ,
आपस के भावों का अन्वय;
विश्व-बंधुत्व की अज़स्र धारा;
प्रभु शीतल करदे सारा जग,
सारा हो व्यापार सत्य का,
सुंदर, शिव हो सब संसार ॥

{ (
१)=ज्वलंत समस्या का प्रश्न ; (२)=वेदान्त दर्शन का द्वैत वाद -ब्रह्म वमाया, दो सृजक-संचालक शक्तियां हैं; (३)=ईश्वर व प्रकृति -हैं भी और नहींभी ( नासदीय सूक्त -ऋग्वेद )
                     ----क्रमश:--सर्ग तीन--









राखी का त्यौहार....ड़ा श्याम गुप्त.....

$
0
0


राखी का त्यौहार....ड़ा श्याम गुप्त.....
                                                        

भाई और  बहन का प्यार कैसे भूल जायं,
बहन ही तो भाई का प्रथम सखा होती है |
भाई ही तो बहन का होता है प्रथम मित्र,
बचपन की यादें कैसी मन को भिगोती हैं |
बहना दिलाती याद,ममता की माँ की छवि,
भाई में बहन, छवि पिता की संजोती है  |
बचपन महकता ही रहे सदा यूंही श्याम ,
बहन को भाई, उन्हें बहनें  प्रिय होती हैं  ||

भाई औ बहन का प्यार दुनिया में बेमिसाल,
यही प्यार बैरी को भी राखी भिजवाता है |
दूर देश  बसे  , परदेश या  विदेश में हों ,
भाइयों को यही प्यार खींच खींच लाता है |
एक एक धागे में बसा असीम प्रेम बंधन,
राखी का त्यौहार रक्षाबंधन बताता है |
निश्छल अमिट बंधन, श्याम'धरा-चाँद जैसा ,
चाँद  इसीलिये  चन्दामामा  कहलाता है ||

रंग विरंगी सजी राखियां कलाइयों पर,
देख  देख भाई  हरषाते  इठलाते  हैं  |
बहन जो लाती है मिठाई भरी प्रेम-रस ,
एक दूसरे को बड़े प्रेम से खिलाते हैं |                                                 दूर देश बसे जिन्हें राखी मिली डाक से,
 बहन की ही छवि देख देख मुसकाते हैं |                                            अमिट अटूट बंधन है ये प्रेम-रीति का,                                               सदा बना रहे श्याम 'मन से मनाते हैं ||





संथारा -- कायरतापूर्ण आत्महत्या है ---ड़ा श्याम गुप्त

$
0
0

संथारा -- कायरतापूर्ण आत्महत्या है ---ड़ा श्याम गुप्त

                        

            बात अन्न जल त्यागने की संथारा की है तो आत्मा के रूप में शरीर में ब्रह्म के उपस्थिति मानी जाती है , शरीर को स्वयं पिंड अर्थात ब्रह्माण्ड का ही रूप माना जाता है | कोई भी ज्ञानी से ज्ञानी नहीं जानता कि मृत्यु कब निश्चित है , अतः अन्न जल छोड़कर तिल तिल कर शरीर को मारना एवं आत्मा को कष्ट देना एवं शरीर को जान  बूझकर अक्षम बनाते जाना , अकर्मण्यता, कायरता, कर्म से दूर भागने का चिन्ह है , वीरों का कृत्य नहीं | वीरों का कृत्य तो स्वस्थ्य शरीर के होते हुए  तुरंत जल समाधि लेलेना या भूमि समाधि लेना है |
                     अतः हाईकोर्ट का निर्णय उचित ही है | राजनीतिक या जन दबाव में अथवा उच्चतम न्यायालय से कुछ भी निर्णय हो, परन्तु संथारा निश्चय ही अमानवीय, कायरतापूर्ण कृत्य है, आत्महत्या है | जैन समाज आत्ममंथन करे , यह उचित अवसर है अपने पंथ को नवीनता देने का || घिसे पिटे तथ्यों परम्पराओं पर घिसटकर न चलता रहे |

सृष्टि महाकाव्य-(ईशत इच्छा या बिगबेंग--एक अनुत्तरित उत्तर -तृतीय सर्ग-सद- नासद खंड--डा श्याम गुप्त

$
0
0


सृष्टि महाकाव्य-(ईशत इच्छा या बिगबेंग--एक अनुत्तरित उत्तर --
                          
तृतीयसर्ग-सद- नासदखंड ( प्रस्तुत सर्ग में ईश्वर या पूर्ण ब्रह्म के व्यक्त ( सद ) व अव्यक्त ( नासद ) कि; वह है भी - और नहीं भी है-केरूप की वैदिक विज्ञान के अनुसार व्याख्या की गयी है तथा -प्रलय-सृष्टि-प्रलय- के क्रमिक चक्र व उसके कारण,( मूलतः मानव के अपकर्म -प्रदूषण -अनाचारीकृत्यआदि...) क्रिया का संक्षिप्त रूप से वर्णन किया गया है..)
-
उसपूर्ण-ब्रह्म, उसपूर्ण-कामसे,
पूर्णजगतहोताविकसित।
उसपूर्ण-ब्रह्मकाकौनभाग,
जगसंरचनामेंव्याप्तहुआ?
क्याशेषबचाजानेनकोई,
वहशेषभीसदापूर्णरहताहै॥
-
वहनित्यप्रकृति, औरजीवात्मा,
उससद-नासदमेंनिहितरहें
होसृष्टि-भाव , तबसदहोते,
औरलयमेंहोंलीनउसीमें।
यहचक्र, सृष्टि1 -लय2 नियमितहै ,
इच्छानुसारउसपर-ब्रह्मके॥
-
इच्छाकरताहैजबलयकी,
वेदेव, प्रकृति, गुण, रूपसभी,
लयहोजातेअपः-तत्व3 में ;
पूर्णसिन्धुउसमहाकाश4 में।
लयहोताजोपूर्ण -ब्रह्ममें ,
फिरभीब्रह्मपूर्णरहताहै॥
-
दृष्टाजबइच्छाकरताहै,
बघुतहोचुकाजगतपसारा।
मानवकीअतिसुख-अभिलाषा ,
सेहैत्रस्तदेवगणसारा
अपःतत्वमेंअपमिश्रण5 से ,
मानवजीवनत्रस्तहोरहा॥
-
नएतत्वनितमनुजबनाता,
जीवनकठिनप्रकृतिदोहनसे।
अंतरिक्ष, आकाश , प्रकृतिमें,
तत्व, भावना, अहं6 ऊर्जा;
केनवीननितअसतकर्मसे,
भारधरापरबढ़ताजाता॥



-
सत्कर्मरूपमेरीभाषाजो,
न्याय, सांख्य, वेदान्त7 बताता;
भूलाअहंकारवश, रजऔर,
पंचभूततम, हीअपनाता।
भूलगयासत, महत्तत्वको,
यद्यपिआत्म-तत्वमेराही॥
-
अपनाअंतसनहींखोजता ,
मुझेढूँढताकहाँकहाँवह;
क्या-क्या, कर्म-अकर्मकररहा।
नष्टकररहामूलदृव्यको;
पानाचाहेकालऔरगति,
हिरण्यगर्भ8 कोयाफिरमुझको ?
-
शायदअबहैरात्रिआगई ,
पूर्णहोगयासृष्टि-कालभी।
कालगतिस्थिरहोजाएं ,
कार्यसभी, लयहोंकारणमें
सततमरज 9 होंसाम्यअक्रिय-अप: ,
मैंअबपुनःएकहोजाऊँ


-
निमिषमात्रमेंउसइच्छाके ,
सब, चेतनजगजीवचराचर ,
देवरूपरसशब्दप्रकृतिविधि ;
ऊर्जावायुजलमहत्तत्वमन,
लयहोजातेमूल-दृव्यमें ,
महा -विष्णुकेनाभि-केंद्रमें॥
१०-
कालगतिस्थिरहोजाते ,
मूलद्रव्यहोसघनरूपमेंसे;
बनजाताहैपिंडरूपमें।
सकलविश्व-ब्रह्माण्डरूपधर,
जलआकाशपृथ्वीकोधारे ,
महाकालरूपीअर्णव10 में॥
११-
वेप्रथमअजायत11 अग्नि-देव,
अपनीविकरालसीदाढोंमें;
ब्रह्माण्डपिंडकोखाजाते,
फिरलयहोतेअपःतत्वमें।
महाकाशमें, महाकालमें ,
जोलयहोताहिरण्यगर्भमें॥
१२-
वहहिरण्यगर्भजोअर्णवमें ,
थादीप्तिमानसत-व्यक्तब्रह्म;
लयहोजाताअक्रिय,अप्रकाशित,
परमतत्वमें; औरएकही,
रहजाताहै , शांत-तमावृत ,
पूर्ण-ब्रह्म, जोसद-नासदहै॥

(
कुंजिका--- =श्रृष्टिरचना , =सृष्टि-नाश, विघटन, प्रलय , =मूलद्रव्य, आदि-पदार्थ , = अनंतअंतरिक्ष ,मनोआकाश, घटाकाश ;=प्रदूषण -मनसावाचाकर्मणा ; =मनवृत्तियोंवालामूलभावतत्व; =भारतीयषड-दर्शनकेअंग ;= सद, सक्रिय, व्यक्तचेतनब्रह्म (ईश्वर); = मूलपदार्थ-प्रकृतिकेतीनगुण ;१०=अंतरिक्ष, क्षीरसागर'११=अजन्मा , नित्य )..


                               ----क्रमश : सर्ग -४...








Viewing all 512 articles
Browse latest View live


Latest Images

<script src="https://jsc.adskeeper.com/r/s/rssing.com.1596347.js" async> </script>