कलम से..: लव जिहाद और आईने का सच (कहानी) - सुधीर मौर्य
अगीत साहित्य दर्पण... की समीक्षा ---हिन्दी प्रचारक पत्रिका वाराणसी ----डा श्याम गुप्त
अगीत साहित्य दर्पण... की समीक्षा ---हिन्दी प्रचारक पत्रिका वाराणसी ----डा श्याम गुप्त
गुरुवासरीय काव्य गोष्ठी २८-५-१५.... डा श्याम गुप्त ...
साप्ताहिक गुरुवासरीय काव्य गोष्ठी दी.२८-५-१५ को डा श्याम गुप्त के आवास , सुश्यानिदी , के-३४८, आशियाना कोलोनी, लखनऊ पर संपन्न हुई |
घनाक्षरी छंदों में वाणी वन्दना से गोष्ठी का प्रारम्भ करते हुए डा श्याम गुप्त ने सातवें दशक में काव्य एवं गीत की दिशाहीनता की एतिहासिक पृष्ठभूमि पर प्रकाश डालते हुए अतुकांत कविता में अगीत के प्रादुर्भाव एवं आगे बढ़ने पर तथा गीत के नए कलेवर नवगीत के प्रादुर्भाव पर चर्चा कीएवं अपना अगीत-गीत सुनाया--
मीत तुम गाओ न गाओ अगीत हम गाकर रहेंगे |
मीत मानो या न मानो , छंद भावों में सजेंगे |
श्री डा रंगनाथ मिश्र सत्य, श्री शीलेन्द्र चौहान, श्रीमती सुषमागुप्ता, रामदेव लाल विभोर, डा सुरेश प्रकाश शुक्ल, डा अखिलेश , श्री श्याम जी श्रीवास्तव, रवीन्द्र अनुरागी, मधुकर अस्थाना, श्री दुबे , श्री कृपाशंकर विश्वास, श्री अग्निहोत्री एवं डा श्याम गुप्त ने काव्य पाठ किया |
| सुषमा गुप्ता काव्यपाठ करते हुए |
| श्री श्याम जी श्रीवास्तव का गीत |
श्रीमती सुषमा गुप्ता ने अपने उद्बोधन गीत द्वारा कवियों को नारियों के मान-सम्मान के प्रति गीत लिखने को प्रेरित करते हुए कहा--
नारियों के मान के हित , जग उठे अभिमान नर में |
आत्म के सम्मान की इच्छा उठे हर एक मन में |
श्री अग्निहोत्री जी ने अपने गद्य में लिखे जाने वाले काव्य 'महाभारत'के अंश प्रस्तुत किये | डा रंगनाथ मिश्र सत्य ने समापन काव्यपाठ के साथ सभी कवियों के काव्य पाठ की संक्षिप्त समीक्षा सहित भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए आभार प्रकट किया |
| डा श्याम गुप्त काव्य पाठ करते हुए साथ में -डा सुरेश शुक्ल, मधुकर अस्थाना, रामदेव लाल विभोर, डा श्याम गुप्त, शीलेन्द्र चौहान, डा रंगनाथ मिश्र सत्य,व डा अखिलेश |
| रवीन्द्र अनुरागी का काव्य पाठ --श्री .दुबे, डा श्याम गुप्त, शीलेन्द्र चौहान, डा सत्य, डा अखिलेश, कृपाशंकर विश्वास ,श्याम जी श्रीवास्तव, रवीन्द्र अनुरागी |
| डा सुरेश शुक्ल का काव्य पाठ |
मेरी पहली दोस्त
माँ की कोख से|
मैं हो गया अचंभा,
यह सोचकर||
कहाँ आ गया मैं,
ये कौन लोग है मेरे इर्द-गिर्द|
इसी परेशानी से,
थक गया मैं रो-रोकर||
तभी एक कोमल हाथ,
लिये हुये ममता का एहसास|
दी तसल्ली और साहस,
मेरा माथा चूमकर||
उसे पता होती मेरी हर जरूरत|
चाहती है वो मुझे,
अपनी जान से भी बढ़कर||
उसकी मौजूदगी देती मेरे दिल को सुकून,
जिसका मेरी जुबां पर पहले नाम आया|
पहला कदम चला जिसकी,
उंगली पकड़कर||
"ज्येष्ठ पूर्णिमा-सन्तकबीर और नागार्जुन" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
कालजयी हैं -गीत t... डा श्याम गुप्त..
गीत, काव्य की शायद सबसे पुरानी विधा है। गीत मनुष्य मात्र की भाषा है।महाकवि निराला नेगीतिका की भूमिका में कहा है - 'गीत-सृष्टि शाश्वत है। समस्त शब्दों का मूल कारण ध्वनिमय ओंकार है। इसी नि:शब्द - संगीत से स्वर-सप्तकों की भी सृष्टि हुई। समस्त विश्व,स्वर का पूंजीभूत रूप है।'
नि होता सत्सि बर्हिषि ||” साम 1 .... हे तेजस्वी अग्नि (ईश्वर) आप ही हमारे होता हो, समस्त कामना पूर्तिकारक स्त्रोता हो, हमारे ह्रदय रूपी अग्निकुंड ( यज्ञ ) हेतु आप ही गीत हो आप ही श्रोता हो |
मनकेमनके
ताड़ोंपर / सीटीदेतीहैं
गर्महवाएँ २४
जलीदूब-सी तलवोंमेंचुभती /यात्राएँ २४
पुनर्जन्मलेकरआतीहैं
धीरे-धीरेढलजाएगा
कबठहराहै? ३२ ---- पूर्णिमावर्मनकानवगीत ..
कैशोर्य उमंग और तरंगें
एक ज्वाला पर सहस्र पतंगे।
तन के उभार और गहराई
नर दृष्टि उधर दौडी आई।।
लक्ष अहेरियों में फँस जाती।
नारी तुम ! सदा ठगी जाती।।---सुधा शर्मा का गीत (रचनाकार से )
अरे, कोई तो बतलाओ !
डाल-डाल पर फूल खिले हैं
ठण्डी सिहरन देती वात
पात गा रहे गीत व कविता
कितने सुहाने दिन और रात
मादकता मौसम में कैसी ,अरे कोइ तो समझाओ | ----विश्वम्भर व्यग्र
"अमन 'चाँदपुरी'का संस्मरण" (प्रस्तोता-डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
लघुकथा "जुनून"अमन 'चाँदपुरी' (प्रस्तोता-डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
मित्रों आज मुझे अमन 'चाँदपुरी'द्वारा भेजी गयी एक लघुकथा प्राप्त हुई। अमन 'चाँदपुरी'एक नवोदित हस्ताक्षर हैं। जिनका परिचय निम्नवत् है- ![]() नाम- अमन सिहं जन्मतिथि- 25 नवम्बर 1997 ई. पता- ग्राम व पोस्ट- चाँदपुर तहसील- टांडा जिला- अम्बेडकर नगर (उ.प्र.)-224230 संपर्क : 09721869421 ई-मेल : kaviamanchandpuri@gmail.com 'जुनून' (लघु कहानी) मात्र पन्द्रह वर्ष की आयु में एक पैर खो देने के बाद रमेश को खाट (चारपाई) पर पड़े-पड़े घुटन सी महसूस होती थी। भागम-भाग की इस दुनिया में एक खाट तक ही उसका जीवन सीमित हो गया था। अन्य भाई-बहनों को चलता देख रमेश खुद को बेबस और लाचार समझने लगा था। एक दिन समाचार पत्र पढते समय खेल पृष्ठ के एक लेख पर रमेश की नज़र पड़ी। शीर्षक था - 'जल्दी चढ़ी पहाड़' रमेश ने इसे विस्तार से पढ़ा। इसमें इन्दू नामक एक पर्वतारोही महिला पर लेख था, जिसने एवरेस्ट पर सबसे कम समय मात्र आठ घण्टे चालिस मिनट में ही विजय प्राप्त कर इतिहास रचा था। रमेश ने इसी से सीख लेकर एवरेस्ट पर चढ़ाई करने की ठानी। रमेश ने अपने पिता जी से इस विषय में बात की और कुछ दिनों के प्रशिक्षण के बाद ही कृत्रिम पैरों की सहायता से सफलता पूर्वक एवरेस्ट पर चढ़ाई की। समय थोड़ा ज्यादा लगा, लगभग तेईस घंटे जो कि एक लंगड़े व्यक्ति के लिहाज से काफी ठीक और बेहतर था। मगर एवरेस्ट की चोटी से नीचे उतरते समय दुर्घटनावश गिर जाने के कारण रमेश की मौत हो गई। लेकिन उसने अपने जीवितता, हौसले और जुनून के दम पर जो काम कर दिखलाया वह आने वाली पढ़ी के लिए मिशाल बन गई। शायद रमेश को एवरेस्ट चढ़ने का मौका ही न मिला होता, मगर पिता जी के समक्ष उसने (रमेश) जो तर्क प्रस्तुत किया, उससे वह (पिता जी) निरुत्तर हो गये। रमेश का कहना था - 'मैं इस चार पाँव के खाट पर पड़े-पड़े अपना जीवन नहीं बिता सकता, एक न एक दिन तो मुझे मरना ही है। लेकिन इस खाट पर पड़े-पड़े तो मैं रोज मर रहा हूँ, मुझे चन्द दिन तो अच्छे से जी लेने दो। इंदू ने एवरेस्ट की चढ़ाई कुछ ही घन्टों में पूरी कर ली, मगर मैं अपाहिज अगर एवरेस्ट पर एक या दो दिन में भी चढ़ सका तो अपना जीवन धन्य समझुगाँ, अगर न चढ़ सका और गिरकर मर गया तो भी खुद को खुशनसीब समझुगाँ कि मैनें अपने जीवन में कुछ करने की ठानी तो थी, क्या हुआ जो सफलता नहीं मिली।' लेकिन पाठकों रमेश को सफलता मिली। -- अमन चाँदपुरी ![]() नोट- दोस्तों ये मत सोचिएगा कि ये कहानी मैनें अपने जनपद की प्रसिद्ध पूर्व बालीबाल खिलाड़ी एवं पर्वतारोही एवरेस्ट विजेता अरुणिमा सिंहापर लिखी है। इसे मैनें नवम्बर 2012 में लिखा था। और अगले ही साल लखनऊ से निकलने वाली त्रैमासिक पत्रिका 'गाँव दुआर'के मार्च अंक में पृष्ठ नम्बर सात पर यह प्रकाशित हुई थी। जब कि अरुणिमा जी ने उसी साल इक्कीस मई को एवरेस्ट पर चढ़ने में सफलता पायी थी। आप ये नहीं कह सकते कि इस कहनी की प्रेरणा अरुणिमा जी हैं। लेकिन हाँ इस कहानी को अरुणिमा जी ने वास्तविकता में परिवर्तित कर दिया। ये मेरा सौभाग्य है। |
कलुषित वृक्ष
कलुषित वृक्ष
नाम:- श्रीअनमोल तिवारी"कान्हा"
पिता:-श्री भँवर लाल जी तिवारी
माता:-श्रीमती नर्बदा देवी
पता:-पुराना राशमी रोड पायक
मोहल्ला वार्ड न•17 कपासन
तहसील:-कपासन
जिला:-चित्तौड़गढ़
राज्य:-राजस्थान
पिन कोड:-312202
सम्पर्क सूत्र:-9694231040 &
8955095189
साहित्य विधा:-गीत ,गजल,कविता,
प्रकाशन:-शब्द प्रवाह , वंदेमातरम
एवं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में
सम्मान:-शारदा साहित्य सम्मान,
अनहद विशिष्ट काव्य सम्मान
****रचना*****
(1) कलुषित वृक्ष
आज भी उठ रहा हैं
काला धुआँ
सरहद के उस पार से
जिसकी विषैली बू
समा रही हैं सीनों में।
और करती है हरा
उस जख्म को
जो वर्षों पहले मिला था
बँटवारे के दिनों में।।
बटँवारा जिसने
बहुत कुछ खोया।
और गुमशुदा घाटियों में
कलुषित बीज बोया।।
आज वो बीज
बन चुका हैं वृक्ष विशाल
जिसकी हरेक शाखाओं पर
है आतंक के काँटे।
और हो रहे हैं विकसित
बारूदी गंध युक्त पुष्प।।
जिसकी हर टहनी पर
लटके हैं कई जहरीले साँप।
जो आतुर हैं निगलने को
मानवीय सँवेदनाएँ
और करते है जहरीली फुकाँर।।
अजीब है खासियत
इस रक्त बीजी वृक्ष की
इसे चाहो जितना काटो
फिर पनप जाता हैं।
और करता है एक
कलुषित अट्ठाहस।।
और उजागर कर देता हैं
मानवीय दुर्बलता को।।
मगर होता है ,अंत हरेक का
यहीं है सृष्टि का नियम।
बस रण चंडी बन
करे सार्थक प्रयत्न हम।।
अपूर्ण योग दिवस
महर्षि पतंजलि के अनुसार योग का अर्थ "योगस्यचित्त वृत्तिनिरोध:"अर्थात योग मन के वृत्ति को रोकता है ,मन के भटकन पर नियंत्रण करता है |उन्होंने योग को आठ भागों में बांटा है जिसको अष्टांग योग कहते हैं | वे इस प्रकार हैं :- १.यम २. नियम ३. आसन ४. प्राणायाम ५. प्रत्याहार ६. धारणा ७.समाधि और ८. ध्यान |
योग दिवस पर आयोजकों ने योग के केवल आसन और प्राणायाम पर ध्यान केन्द्रित किया है | इसके पहले यम और नियम आते हैं परन्तु इन पर ध्यान देना उचित नहीं समझा क्योंकि यम के अन्तर्गत "सत्य व अहिंसा का पालन , चोरी न करना ,आवश्यकता से अधिक चीजों का इकठ्ठा न करना "शामिल है | आज जग जाहिर है कि नेता न सत्य के मार्ग पर चलते हैं न अहिंसा का पालन करते हैं | इसके विपरीत वे दो समुदायों में हिंसा फैलाकर अपने वोटबैंक को पक्का करते हैं | मंत्री बड़े बड़े घपला कर सरकारी धन का गबन करते हैं ,दुसरे शब्दों में कहे तो चोरी करते हैं | बेनामी धंधों में माल इकठ्ठा करते हैं | ये सब योग के यम सिद्धांत के विपरीत हैं |इस दशा में यम का पालन कैसे कर सकते हैं ? अत; नेताओं ने यम पर न बोलना ही अपने हित में समझा और यम,नियम को छोड़कर सीधा आसन और प्राणायाम को योग के रूप में प्रस्तुत किया | योग के मूल सिद्धांत को छोड़कर केवल शारीरिक व्यायाम को ही योग का नाम दे दिया | यदि सही मायने में योग को अपनाना चाहते है तो योग के सभी आठ अंगों का पूरा पूरा पालन करना चाहिए | भ्रष्टाचार में डूबे देश के लिए यह उचित होगा कि मंत्री ,नेता ,सकारी व अ-सरकारी कर्मचारी पहले यम का पालन करने का शपथ लें और तदनुरूप व्यावहार करे तभी योग दिवस मनाना सफल माना जायगा अन्यथा यह एक और दिखावा बनकर रह जायगा |
कालीपद "प्रसाद"
"क्षणिकाकार अमन चाँदपुरी" (समीक्षक-डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
"क्षणिकाकार अमन चाँदपुरी" क्षणिका के क्रम में आज एक नवोदित आशुकवि अमन ‘चाँदपुरी’ का परिचय पाठको से करा रहा हूँ। जिन्होंने ढेर सारी क्षणिकाओं को रचा है। उनकी क्षणिकाओं में मुझे मर्मस्पर्शी भाव देखने को मिला है। मेरे विचार से “क्षण की अनुभूति को चुटीले शब्दों में पिरोकर परोसना ही क्षणिका होती है। अर्थात मन में उपजे गहन विचार को थोड़े से शब्दों में इस प्रकार बाँधना कि कलम से निकले हुए शब्द सीधे पाठक के हृदय में उतर जाये।” देखिए इनकी यह क्षणिका- 'दरार' जब दरार पडती है रिश्तों में वो आसानी से नहीं भरती दीवार की दरारप्लास्टर भर सकता हैं मगर रिश्तों में पड़ी दरार बहुत मुश्किल से भरती हैं जब कभी भरती हैं तब भी अपना निशान छोड़ जाती हैं। इनकी एक अत्यन्त मार्मिक क्षणिका भी है। जिसमें जीवन का दर्शन निहित है- 'मौत' सिर्फ दो अक्षरऔर एक मात्रा जिससे बचाया मैंनेजीवन भर क्या था वो शब्द मौत अन्धविश्वास के खिलाफ भी इनका स्वर मुखरित हुआ है- 'बासी लकीरें' मेरी बचकानी उम्र में ही हाथ की जिन लकीरों को पढ़कर पंडित बाबा ने मेरी भयानक कुंडली बनाई थी बड़े होते ही मैनेंउन सभी बासी पड़ी लकीरों कोउतार फेंका खुद नई-नई और ताजा लकीरें बनाने के लिए बालश्रमिक के विरुद्ध अपनी अभिव्यक्ति को इन्होंने एक अलग ही अन्दाज़ में अपनी इस क्षणिका में व्यक्त किया है- 'बालमजदूर' स्टील का बर्तन सीसे-सा चमकने लगा एक परिवार के पालनहार ने उसमें देखा – अपना मासूम-सा चेहरा उसे ठगा महसूस हुआ सोचा – मैं समय से बहुत पहले बड़ा हो गया मुहावरे को क्षणिका में पिरोना बहुत कम लोग ही जानते हैं मगर इन्होंने मुहावरे का प्रयोग अपनी क्षणिका में सफलता के साथ किया है- 'समय' समय के पाँवभारी हैं उसे तेज चलनान सिखाओ करेला नीम चढ़ जायेगा लोग सपिकाएँ लिखते हैं मगर इन्होंने अपनी सीपिका को क्षणिका के रूप में इस प्रकार पिरोया है। 'बुजुर्ग' बुजुर्ग की आँखें अनुभव का सागर जैसा कि मैंने पहले ही उल्लेख किया है “आशुकवि ही सफल क्षणिकाकार हो सकता है। इनकी क्षणिकासृजन क्षमता इनकी निम्न क्षणिका का जीता जागता उदाहरण है- 'आशुकवि' कुछ समय के लिए समय के पैरों में बेड़ियाँ डाल दो मैं आशुकवि बनना चाहता हूँ जो तत्काल कविता ही नहीं सम्पूर्ण ग्रंथ रचने में सक्षम हो मुझे आशा ही नहीं अपितु विश्वास भी है कि ये भविष्य में एक सफल साहित्यकार सिद्ध होंगे। मैं इनके उज्जवल भविष्य की कामना करता हूँ। शुभकामनाओं के साथ! समीक्षक (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’) कवि एवं साहित्यकार टनकपुर-रोड, खटीमा जिला-ऊधमसिंहनगर (उत्तराखण्ड) 262 308 E-Mail . roopchandrashastri@gmail.com Website. http://uchcharan.blogspot.com/ फोन-(05943) 250129 मोबाइल-09997996437 अमन चाँदपुरी का परिचय निम्नवत् है- जन्मतिथि- 25 नवम्बर 1997 जन्म स्थान- ग्राम व पोस्ट - चाँदपुर, टांडा, अम्बेडकर नगर शिक्षा- बी. ए. पिता - श्री सुनील कुमार सिंह लेखन- 15 मई 2012 से विधाएं- कविता, क्षणिका, हाइकु सम्पर्क- ग्राम व पोस्ट -चाँदपुर, टांडा, अम्बेड़कर नगर, यू.पी. मोबाईल - +919721869421 मेल- kaviamanchandpuri@gmail.com |
समलैंगिक विवाह ------आखिर हम जाना कहाँ चाहते हैं ?? ..ड़ा श्याम गुप्त....
विप्राः प्राहुस्तथा चैतद्यो भर्ता सांस्म्रतांगना ॥“
मेरी नवीन कृति ...कुछ शायरी की बात होजाए --ड़ा श्याम गुप्त ...
"महाकवि तुलसीदास की जयन्ती पर विशेष’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
महाकवि तुलसीदास की जयन्ती पर विशेष "सूर-सूर तुलसी शशि, उडुगन केशव दास। अब के कवि खद्योत सम, जहँ-तहँ करत प्रकाश।।’’ ब्लागर मित्रों! आज से 26 वर्ष पूर्व मेरा एक लेख नैनीताल से प्रकाशित होने वाले समाचारपत्र "दैनिक उत्तर उजाला" में प्रकाशित हुआ था। इसे साफ-साफ पढ़ने के लिए- कृपया समाचार की कटिंग पर एक चटका लगा दें। भगवान राम की गाथा को रामचरित मानस के रूप में जन-जन में प्रचारित करने वाले महाकवि तुलसीदास की स्मृति |
शरीर में आत्मा का निवास कहाँ होता है ...ड़ा श्याम गुप्त ..
अगीत महाकाव्य ---सृष्टि --बिगबेंग या ईषत - इच्छा -एक अनुत्तरित उत्तर.-सर्ग-१ .... डा श्याम गुप्त....
सृष्टि ..ईषत -इच्छा या बिग-बेंग;एक अनुत्तरित उत्तर-डा श्याम गुप्त...
सृष्टि -सृजन के आधुनिक वैज्ञानिक, वैदिक एवं दार्शनिक-आध्यात्मिक तथ्यों का समन्वित विवेचन द्वारा उत्तर की खोज विषयक यह महाकाव्य ११ सर्गों में विरचित है | इस महाकाव्य हेतु मैंने अगीत विधा का एक विशिष्ट नवीन छंद की सृष्टि की है जिसे मैंने "लयबद्ध षटपदी अगीत छंद" का नाम दिया है आज से हम इसे क्रमिक रूप में प्रस्तुत करेंगे | प्रस्तुत है प्रथम सर्ग -वन्दना ...
सृष्टि -ईषत-इच्छा या बिग-बेंग; एक अनुत्तरित उत्तर ( अगीत विधा महाकाव्य)
(यह महाकाव्य अगीत विधा में आधुनिक-विज्ञान ,दर्शन व वैदिक विज्ञान के समन्वयात्मक विषय पर सर्वप्रथम रचित महाकाव्य है, इसमें सृष्टि की उत्पत्ति, ब्रह्माण्ड व जीवन व मानव की उत्पत्ति के गूढ़तम विषय को सरल भाषा में व्याख्यायित किया गया है ....एवं अगीत विधा के लयबद्ध षटपदी छंद में निवद्ध किया गया है जो एकादश सर्गों में वर्णित है.... रचयिता )
रचयिता----डा.श्याम गुप्त
प्रकाशक---अखिल भा.अगीत परिषद् ,लखनऊ.
प्रथम-सर्ग --वन्दना
१-गणेश -
गण-नायक गज बदन विनायक ,
मोदक प्रिय,प्रिय ऋद्धि-सिद्धि के ;
भरें लेखनी में गति, गणपति ,
गुण गाऊँ इस 'सृष्टि', सृष्टि के।
कृपा 'श्याम पर करें उमासुत ,
करूं वन्दना पुष्पार्पण कर।।
२-सरस्वती --
वीणा के जिन ज्ञान स्वरों से,
माँ ! ब्रह्मा को हुआ स्मरण'१' |
वही ज्ञान स्वर ,हे माँ वाणी !
ह्रदय तंत्र में झंकृत करदो |
सृष्टि ज्ञान स्वर मिले श्याम को,
करूं वन्दना पुष्पार्पण कर॥
३-शास्त्र -
हम कौन, कहाँ से आए हैं ?
यह जगत पसारा किसका,क्यों ?
है शाश्वत यक्ष-प्रश्न, मानव का।
देते हैं, जो वेद - उपनिषद् ,
समुचित उत्तर; श्याम'उन्ही की,
करूं वन्दना पुष्पार्पण कर॥
४-ईश्वर-सत्ता --
स्थिति, सृष्टि व लय का जग के,
कारण-मूल जो वह परात्पर;
सद-नासद में अटल-अवस्थित,
चिदाकास में बैठा - बैठा,
संकेतों से करे व्यवस्था,
करूं वन्दना पुष्पार्पण कर ॥
५-ईषत-इच्छा--'२'
उस अनादि की ईषत-इच्छा
महाकाश के भाव अनाहत,
में, जब द्वंद्व-भाव भरती है ;
सृष्टि-भाव तब विकसित होता-
आदि कणों में, उस इच्छा की,
करूँ वन्दना पुष्पार्पण कर॥
६- अपरा -माया --
कार्यकारी भाव-शक्ति है,
उस परात्पर ब्रह्म की जो;
कार्य-मूल कारण है जग की,
माया है उस निर्विकार की;
अपरा'३'दें वर,श्याम'सृष्टि को,
करूँ वन्दना पुष्पार्पण कर॥
७.चिदाकाश --
सुन्न-भवन'४'में अनहद बाजे ,
सकल जगत का साहिब बसता;
स्थिति,लय और सृष्टि साक्षी,
अंतर्मन में सदा उपस्थित,
चिदाकाश की, जो अनंत है;
करूँ वन्दना पुष्पार्पण कर॥
८-विष्णु --
हे ! उस अनादि के व्यक्त भाव,
हे! बीज-रूप हेमांड'५'अवस्थित;
जगपालक, धारक, महाविष्णु,
कमल-नाल ब्रह्मा को धारे;
'श्याम-सृष्टि'को, श्रृष्टि धरा दें,
करूँ वन्दना पुष्पार्पण कर॥
९-शंभु-महेश्वर --
आदिशंभु - अपरा संयोग से,
महत-तत्व'६'जब हुआ उपस्थित,
व्यक्त रूप जो उस निसंग का।
लिंग रूप बन तुम्ही महेश्वर !
करते मैथुनि-सृष्टि अनूप;
करूँ वन्दना पुष्पार्पण कर॥
१०-ब्रह्मा --
कमल नाल पर प्रकट हुए जब,
रचने को सारा ब्रह्माण्ड;
वाणी की स्फुरणा'७'पाकर,
बने रचयिता सब जग रचकर ।
दिशा-बोध मिल जाय 'श्याम,को;
करूँ वन्दना पुष्पार्पण कर॥
११-दुष्टजन -वन्दना--
लोभ-मोह वश बन खलनायक,
समय-समय पर निज करनी से;
जो कर देते व्यथित धरा को ।
श्याम, धरा को मिलता प्रभु का,
कृपा भाव, धरते अवतार;
करूँ वन्दना पुष्पार्पण कर॥ ---क्रमश:
कुंजिका----
----------------सृष्टि महाकाव्य क्रमशः ---द्वितीय सर्ग -- उपसर्ग ...अगली पोस्ट में
सृष्टि-महाकाव्य --बिगबेंग या ईषत - इच्छा -एक अनुत्तरित उत्तर.-सर्ग-२.... डा श्याम गुप्त....
महाकाव्य ---सृष्टि --बिगबेंग या ईषत - इच्छा -एक अनुत्तरित उत्तर.-सर्ग-२ ....उपसर्ग..
(यह महाकाव्य अगीत विधा में आधुनिक-विज्ञान ,दर्शन व वैदिक विज्ञान के समन्वयात्मक विषय पर सर्वप्रथम रचित महाकाव्य है, इसमें सृष्टि की उत्पत्ति, ब्रह्माण्ड व जीवन व मानव की उत्पत्ति के गूढ़तम विषय को सरल भाषा में व्याख्यायित किया गया है ....एवं अगीत विधा के लयबद्ध षटपदी छंद में निवद्ध किया गया है जो एकादश सर्गों में वर्णित है.... रचयिता )
रचयिता----डा.श्याम गुप्त.....प्रकाशक---अखिल भा.अगीत परिषद् ,लखनऊ.
नर ने भुला दिया प्रभु नरसे,
ममताबंधननेहसमर्पण;
मानव का दुश्मन बन बैठा ,
अनियंत्रित वह अति-अभियंत्रण।
अति सुख अभिलाषा हित जिसको,
स्वयं उसी ने किया सृजन था।।
२.
निजी स्वार्थ के कारण मानव,
अति दोहन कर रहा प्रकृति का;
प्रतिदिन एक ही स्वर्ण अंड से,
उसका लालच नहीं सिमटता;
चीर कलेजा, स्वर्ण खजाना,
पाना चाहे एक साथ ही।।
३.
सर्वश्रेष्ठ है कौन?, व्यर्थ ,
इस द्वंद्व भाव में मानव उलझा;
भूल गया है मानव ख़ुद ही ,
सर्वश्रेष्ठ कृति है, ईश्वर की ।
सर्वश्रेष्ठ, क्यों कोई भी हो ,
श्रेष्ठ क्यों न हों,भला सभी जन।।
४.
पहले सभी श्रेष्ठ बन जाएँ,
आपस के सब द्वंद्व मिटाकर;
द्वेष,ईर्ष्या, स्वार्थ भूलकर,
सबसे समता भाव निभाएं;
मन में भाव रमें जब उत्तम,
प्रेम भाव का हो विकास तब।।
५.
जन संख्या के अभिवर्धन से,
अनियंत्रित यांत्रिकी करण से;
बोझिल बोझिल मानव जीवन।
भार धरा पर बढ़ता जाता,
समय-सुनामी की चेतावनि,
समझ न पाये,प्रलय सुनिश्चित।
जग की इस अशांति क्रंदन का,
लालच लोभ मोह बंधन का;
भ्रष्ट- पतित सत्ता गठबंधन,
यह सब क्यों? इस यक्ष प्रश्न(१) का,
एक यही उत्तर, सीधा सा,
भूल गया नर आज स्वयं को।।
७.
क्यों मानव ने भुला दिया है,
वह ईश्वर का स्वयं अंश है;
मुझमें तुझमें शत्रु मित्र में;
ब्रह्म समाया कण-कण में वह|
और स्वयं भी वही ब्रह्म है,
फ़िर क्या अपना और पराया।।
८.
सोच हुई है सीमित उसकी,
सोच पारहा सिर्फ़ स्वयं तक;
त्याग, प्रेम उपकार-भावना,
परदुख,परहित,उच्चभाव सब ;
हुए तिरोहित,सीमित है वह,
रोटी कपडा औ मकान तक।।
कारण-कार्य,ब्रह्म औ माया(२)
सद-नासद(3) पर साया किसका?
दर्शन और संसार प्रकृति के ,
भाव नहीं अब उठते मन में;
अन्धकार- अज्ञान- में डूबा,
भूल गया मानव ईश्वर को।।
१०.
सभी समझलें यही तथ्य यदि,
हम एक बृक्ष के ही फल हैं;
वह एक आत्म-सत्ता, सबके,
उत्थान-पतन का कारण है;
जिसका भी बुरा करें चाहें,
वह लौट हमीं को मिलना है।।
११.
हम कौन?,कहाँ से आए है?
और कहाँ चले जाते हैं सब?
यह जगत-पसारा कैसे,क्यों?
और कौन? समेटे जाता है।
निज को,जग को यदि जानेंगे,
तब मानेंगे, समता भाव ।।
१२.
तब नर,नर से करे समन्वय ,
आपस के भावों का अन्वय;
विश्व-बंधुत्व की अज़स्र धारा;
प्रभु शीतल करदे सारा जग,
सारा हो व्यापार सत्य का,
सुंदर, शिव हो सब संसार ॥
{ (१)=ज्वलंत समस्या का प्रश्न ; (२)=वेदान्त दर्शन का द्वैत वाद -ब्रह्म वमाया, दो सृजक-संचालक शक्तियां हैं; (३)=ईश्वर व प्रकृति -हैं भी और नहींभी ( नासदीय सूक्त -ऋग्वेद )
राखी का त्यौहार....ड़ा श्याम गुप्त.....
संथारा -- कायरतापूर्ण आत्महत्या है ---ड़ा श्याम गुप्त
संथारा -- कायरतापूर्ण आत्महत्या है ---ड़ा श्याम गुप्त
बात अन्न जल त्यागने की संथारा की है तो आत्मा के रूप में शरीर में ब्रह्म के उपस्थिति मानी जाती है , शरीर को स्वयं पिंड अर्थात ब्रह्माण्ड का ही रूप माना जाता है | कोई भी ज्ञानी से ज्ञानी नहीं जानता कि मृत्यु कब निश्चित है , अतः अन्न जल छोड़कर तिल तिल कर शरीर को मारना एवं आत्मा को कष्ट देना एवं शरीर को जान बूझकर अक्षम बनाते जाना , अकर्मण्यता, कायरता, कर्म से दूर भागने का चिन्ह है , वीरों का कृत्य नहीं | वीरों का कृत्य तो स्वस्थ्य शरीर के होते हुए तुरंत जल समाधि लेलेना या भूमि समाधि लेना है |
अतः हाईकोर्ट का निर्णय उचित ही है | राजनीतिक या जन दबाव में अथवा उच्चतम न्यायालय से कुछ भी निर्णय हो, परन्तु संथारा निश्चय ही अमानवीय, कायरतापूर्ण कृत्य है, आत्महत्या है | जैन समाज आत्ममंथन करे , यह उचित अवसर है अपने पंथ को नवीनता देने का || घिसे पिटे तथ्यों परम्पराओं पर घिसटकर न चलता रहे |
सृष्टि महाकाव्य-(ईशत इच्छा या बिगबेंग--एक अनुत्तरित उत्तर -तृतीय सर्ग-सद- नासद खंड--डा श्याम गुप्त
तृतीयसर्ग-सद- नासदखंड ( प्रस्तुत सर्ग में ईश्वर या पूर्ण ब्रह्म के व्यक्त ( सद ) व अव्यक्त ( नासद ) कि; वह है भी - और नहीं भी है-केरूप की वैदिक विज्ञान के अनुसार व्याख्या की गयी है तथा -प्रलय-सृष्टि-प्रलय- के क्रमिक चक्र व उसके कारण,( मूलतः मानव के अपकर्म -प्रदूषण -अनाचारीकृत्यआदि...) वक्रिया का संक्षिप्त रूप से वर्णन किया गया है..)
१-
उसपूर्ण-ब्रह्म, उसपूर्ण-कामसे,
पूर्णजगतहोताविकसित।
उसपूर्ण-ब्रह्मकाकौनभाग,
जगसंरचनामेंव्याप्तहुआ?
क्याशेषबचाजानेनकोई,
वहशेषभीसदापूर्णरहताहै॥
२-
वहनित्यप्रकृति, औरजीवात्मा,
उससद-नासदमेंनिहितरहें।
होसृष्टि-भाव , तबसदहोते,
औरलयमेंहोंलीनउसीमें।
यहचक्र, सृष्टि1 -लय2 नियमितहै ,
इच्छानुसारउसपर-ब्रह्मके॥
३-
इच्छाकरताहैजबलयकी,
वेदेव, प्रकृति, गुण, रूपसभी,
लयहोजातेअपः-तत्व3 में ;
पूर्णसिन्धुउसमहाकाश4 में।
लयहोताजोपूर्ण -ब्रह्ममें ,
फिरभीब्रह्मपूर्णरहताहै॥
४-
दृष्टाजबइच्छाकरताहै,
बघुतहोचुकाजगतपसारा।
मानवकीअतिसुख-अभिलाषा ,
सेहैत्रस्तदेवगणसारा।
अपःतत्वमेंअपमिश्रण5 से ,
मानवजीवनत्रस्तहोरहा॥
५-
नएतत्वनितमनुजबनाता,
जीवनकठिनप्रकृतिदोहनसे।
अंतरिक्ष, आकाश , प्रकृतिमें,
तत्व, भावना, अहं6 वऊर्जा;
केनवीननितअसतकर्मसे,
भारधरापरबढ़ताजाता॥
सत्कर्मरूपमेरीभाषाजो,
न्याय, सांख्य, वेदान्त7 बताता;
भूलाअहंकारवश, रजऔर,
पंचभूततम, हीअपनाता।
भूलगयासत, महत्तत्वको,
यद्यपिआत्म-तत्वमेराही॥
७-
अपनाअंतसनहींखोजता ,
मुझेढूँढताकहाँकहाँवह;
क्या-क्या, कर्म-अकर्मकररहा।
नष्टकररहामूलदृव्यको;
पानाचाहेकालऔरगति,
हिरण्यगर्भ8 कोयाफिरमुझको ?
८-
शायदअबहैरात्रिआगई ,
पूर्णहोगयासृष्टि-कालभी।
कालऔगतिस्थिरहोजाएं ,
कार्यसभी, लयहोंकारणमें।
सततमरज 9 होंसाम्यअक्रिय-अप: ,
मैंअबपुनःएकहोजाऊँ॥
निमिषमात्रमेंउसइच्छाके ,
सब, चेतनजगजीवचराचर ,
देवरूपरसशब्दप्रकृतिविधि ;
ऊर्जावायुजलमहत्तत्वमन,
लयहोजातेमूल-दृव्यमें ,
महा -विष्णुकेनाभि-केंद्रमें॥
१०-
कालऔगतिस्थिरहोजाते ,
मूलद्रव्यहोसघनरूपमेंसे;
बनजाताहैपिंडरूपमें।
सकलविश्व-ब्रह्माण्डरूपधर,
जलआकाशपृथ्वीकोधारे ,
महाकालरूपीअर्णव10 में॥
११-
वेप्रथमअजायत11 अग्नि-देव,
अपनीविकरालसीदाढोंमें;
ब्रह्माण्डपिंडकोखाजाते,
फिरलयहोतेअपःतत्वमें।
महाकाशमें, महाकालमें ,
जोलयहोताहिरण्यगर्भमें॥
१२-
वहहिरण्यगर्भजोअर्णवमें ,
थादीप्तिमानसत-व्यक्तब्रह्म;
लयहोजाताअक्रिय,अप्रकाशित,
परमतत्वमें; औरएकही,
रहजाताहै , शांत-तमावृत ,
पूर्ण-ब्रह्म, जोसद-नासदहै॥
( कुंजिका---१ =श्रृष्टिरचना , २=सृष्टि-नाश, विघटन, प्रलय , ३=मूलद्रव्य, आदि-पदार्थ , ४= अनंतअंतरिक्ष ,मनोआकाश, घटाकाश ;५=प्रदूषण -मनसावाचाकर्मणा ; ६=मनववृत्तियोंवालामूलभावतत्व; ७=भारतीयषड-दर्शनकेअंग ;८= सद, सक्रिय, व्यक्तचेतनब्रह्म (ईश्वर); ९= मूलपदार्थ-प्रकृतिकेतीनगुण ;१०=अंतरिक्ष, क्षीरसागर'११=अजन्मा , नित्य )..
----क्रमश : सर्ग -४...



















